बांदीपुर से सिमलिपाल
20. बांदीपुर से सिमलिपाल
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हो |
टल की ओर बढ़ते हुए मयंक सोचता
रहा—आज की मुलाक़ात से उसे क्या हाथ लगा। चंद्रहास, सूर्यभान
और मल्लिका से हुई गुफ़्तगू ने उसकी झोली में जैसे एक नया सुराग डाल दिया था। अब
उसे लगने लगा था कि इन तमाम वारदातों की कड़ियाँ जोड़कर वह एक मुकम्मल जुर्म की
दास्तान खड़ी कर सकता है।
पहले उसने एक पुराना रेलवे टिकट टटोला था और वहीं से एक अहम सुराग
पकड़ लिया: 26 जनवरी 2012 को आरोहण नीलगिरी माउंटेन रेल से
उदगमंडलम से मेट्टूपालयम सफ़र कर रहा था। अब चंद्रहास ने भी आधे-अधूरे शब्दों में
मान लिया था कि बारह साल पहले सूर्यभान और उसके साथी अपने बेचारे, दिमाग़ से कमज़ोर भतीजे को कर्नाटक के उन जंगलों में छोड़ आए थे, जहाँ बाघ खुले घूमते हैं।
मयंक ने जेहन में नक़्शा बनाकर हिसाब लगाया। ऐसा लग रहा था कि आरोहण नीलगिरी
की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द, शायद पटरियों के पास, बेमक़सद
भटक रहा था। मगर गुत्थी वही रही: आख़िर उसे उस ट्रेन में चढ़ाया किसने? और कैसे?
मयंक के दिल ने कहा—वक़्त आने पर वह इस गुमशुदा कड़ी को भी तलाश लेगा।
होटल पहुँचने पर उसने देखा कि आरोहण पूरी तरह होश में आ चुका था।
नहा-धोकर एकदम तैयार, अपने जिगरी दोस्त का इंतज़ार कर रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब बेचैनी थी,
जिसे मयंक अनदेखा नहीं कर सका।
“बहुत देर कर दी रे तू,” आरोहण ने शिकवा किया। पहली बार उसने अपनी खीझ खुलकर
जताई।
मयंक ने उसकी बेचैनी समझने की कोशिश की—शायद वह अपनी मेहनत से संजोए
हुए ख़्वाब को खोना नहीं चाहता था।
हाँ, यही वजह होगी!
“माफ़ करना यार, जल्दी नहीं आ
सका। रास्ते में एक पुराना दोस्त मिल गया… बरसों बाद अचानक टकरा गए,” मयंक ने सफ़ेद झूठ जड़ दिया।
“और ये देख—ये सपना तेरे लिए है। मैं इसे लेकर तैयार
बैठा हूँ, और इसे भूलने की ग़लती नहीं कर सकता,” आरोहण बोला।
“अच्छा, ठीक है, यार, शुरू कर—मैं
ग़ौर से सुन रहा हूँ,” मयंक ने कहा।
और फिर, आरोहण ने अपना सपना याद करके सुनाना शुरू किया।
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यह इलाक़ा दक्षिण-पश्चिम कोलकाता का एक मोहल्ला था, बेहाला-चौरास्ता की एक
तंग, बेनाम गली के पास। वहीं मेरी भेंट एक भिखमंगे से हुई,
जो बड़ी बेचारगी में मिन्नत कर रहा था—“बाबू, एक
रुपया दे दो… बहुत भूख लगा है।” समय था कोई साढ़े छह का—भिखारी की रोज़ी-रोटी शुरू
करने के लिए कुछ ज़्यादा ही जल्दी।
मैं छोटे शहर का आदमी हूँ, जहाँ हर कोई — भिखारी भी — अपनी अलग पहचान रखता है।
बिना नाम लिए सिक्का थमाना मुझे गवारा नहीं। अगर नाम मालूम न हो, तो मैं दिल से कोई प्यारा-सा नाम जड़ देता हूँ। नेत्रहीन ‘सूरदास’ बन जाता,
गाने वाला ‘तानसेन’, और जिसकी चोटी सलीके से
बंधी हो, वह ‘महाराज’। उसकी चोटी देखकर लगता जैसे
बैंक-बैलेंस भी तगड़ा होगा। मुझे नागवार गुज़रता है कि लोग हर भिखारी को आलसी कहकर
टरका देते हैं।
उस भिखारी के चेहरे में कुछ अजीब-सा तिलिस्म था—नाक पर मस्से जैसा
उभार, जैसे
ज़िद्दी मक्खी चिपकी हो। मूँछों के बीच पतली-सी दरार, मानो
ऊपरी होंठ बीच से फटा हो। माथे पर बालों की भँवर थी, जो किसी
तरह काबू में न आ रही थी। ठोड़ी पर बेतरतीब दाढ़ी, और गाल
एकदम चिकने। टेढ़े-मेढ़े दाँत ऐसे झाँकते कि ऊपरी होंठ उन्हें छिपा ही न सका। मगर
आँखों में अजीब चमक थी—जैसे कुछ कहने को बेक़रार हो। मुझे तो उस मस्से को छूकर
उसकी बनावट महसूस करने का भी चस्का हुआ।
धीरे-धीरे याददाश्त लौट आई। अरे, यह अजनबी नहीं है, वही लंबू
था—पड़ोसी का बेटा, जो चौदह बरस पहले गुम हो गया था।
यह सब हुआ था 1989 की एक धूल-भरी दोपहर को—जुलाई बीत रहा था मगर गर्मी
उतरने का नाम नहीं ले रही थी। लंबू अपने चाचाओं के साथ बाज़ार गया था। रात नौ बजे
जब सब लौटे, तो लंबू गायब था।
अरे बाप रे! वो रात! जैसे मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ़ घुस गई हो।
खबर सुनते ही लगा कि गाँव की सारी खुशियाँ किसी ने निचोड़ ली हों। कोई खरीदारों को
कोस रहा था, तो कोई ‘हाय-हाय’ कर रहा था। मगर मेरे मन में उसी वक्त शंका हुई—यह किस्सा
जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं।
लंबू उस वक्त सत्रह वर्ष का था।
अगर दिमाग़ी कमज़ोरी जुर्म होती, तो उसके माथे पर यह इल्ज़ाम लिखा होता। गली-मुहल्ले
के लौंडे-लपाड़े तो रोज़ उस पर ज़ुल्म ढाते ही थे, मगर
अफ़सोस यह था कि उसका अपना कुनबा भी नफ़रत करने में पीछे न था। ईश्वर के ख़िलाफ़
जो ग़ुस्सा था, वही धीरे-धीरे लंबू पर उतर आया। पहले से ही
बापू से महरूम, ऊपर से घर की बेरुख़ी ने उसकी ज़िंदगी और भी
दुखभरी बना दी। बाकी बच्चे खा-पीकर जवान हो रहे थे, मगर
बेचारा लंबू हमेशा अधपेट रह गया। हाँ, उसकी क़द-काठी बढ़ती
ही रही—रब ही जाने कैसे! सबका सर पार कर गया, और तभी से उसका
नाम पड़ गया—लंबू।
“लंबू-लंबू, बांस पे
तंबू-तंबू”—गाँव का बेरहम नारा, जो उसके पीछे गूंजता रहता।
इस तरह लंबा-चौड़ा, खूनहीन और मासूम-सा लड़का पूरे गाँव का मसख़रा बन
गया। लंबाई का दुःख भी कम न था—अकसर चौखटों से सिर टकरा जाता था। हमउम्र दोस्त—या
यूँ कहें, सताने वालों का दस्ता—उसकी पीठ पर कभी कील तो कभी
बाँस की काँटी गड़ा देते, और उसकी तड़प देख-देखकर मज़ा
लूटते।
चोर, जानवर और पागल—तीनों पर ठप्पा लगाना समाज का फ़ैशन बन चुका था।
“निर्दोष को चुभो” नाम का खेल चलता रहा। एक दिन नया
सताने वाला गोदना कलाकार सुई लेकर आ धमका। सुई देखते ही लंबू काँपने लगा। भागना
चाहा, मगर चचेरा भाई—जो बस तमाशा देखना चाहता था—उसे दबोच
लिया।
“मेहरबानी करो भैया, छोड़ दो…”
लंबू ने रोते-रोते फ़रियाद की। कुछ देर फूट-फूट कर रोया, फिर
अचानक चुप हो गया।
“वाह, यही है शरीफ़ बच्चे का
सलीक़ा,” टैटूवाला बोला और बेगुनाह की चमड़ी में सुई गाड़ता
चला गया—मानो गाँव की नफ़रत उसकी देह पर नक़्श कर रहा हो।
अचानक लंबू को लगा कि पकड़ ढीली पड़ गई है। वह झटपट उठा और दौड़ पड़ा।
दौड़ता ही चला गया—कहाँ, कोई न जानता। उस रात न लौटा, अगली
सुबह भी नहीं। हाँ, दूसरे दिन दोपहर को, जब भूख ने बेहाल कर दिया, तब लौट आया।
लेकिन तब तक उसके दाएँ हाथ पर नाम के पहले तीन अक्षर—‘LAM’—गुद चुके थे। सब बड़े
अंग्रेज़ी हरफ़ में! मानो रिश्तेदारों को आभास हो कि एक दिन यह लड़का अंग्रेज़ी
दुनिया में भटकेगा।
अब वह अधूरा टैटू उसकी त्वचा पर हमेशा के लिए दर्ज था—जैसे उसकी नाक
का मस्सेदार दाग़।
आज, मैंने अपने ख़्वाब में उस भिखारी को पहचान लिया। अरे, वह कोई और नहीं, बल्कि लंबू था—मेरा देहाती चचेरा
भाई। उसकी बाँह पर वही अधूरा तीन-अक्षरी टैटू साफ़ झलक रहा था।
उस जुलाई की उमस-भरी दोपहर के बाद दिन-ब-दिन गुज़रते गए। लंबू की कोई
ख़बर न आई—न किसी सर्वज्ञ कौवे ने सुराग दिया, न किसी और ने। वक़्त के साथ घरवालों ने भी उसे भुला
दिया। गली-मुहल्ले के शरारती लौंडे अब नई-नई ज़ालिमियाँ करते—कभी बिल्ली को सताते,
कभी बैल को नशा चढ़ाकर तमाशा बनाते। वे भी लंबू को भूल चुके थे—जिसे
बरसों तक सताकर मज़ा लूटते रहे थे।
और इस तरह, पूरे बारह साल चुपचाप गुज़र गए।
शिक्षा ने शैतानों को सज्जन बना दिया। बाड़ की झाड़ियाँ पेड़ों में
बदल गईं, जो खास मुकामों की पहचान बन गईं। वो कौवे और गिद्ध, जो
हम बचपन में स्कूल जाते समय देखते थे, अब नदारद हो गए। गाँव
का साहूकार—कर्ज़दारों के ग़ुस्से से घबराकर—शहर भाग निकला।
मगर लंबू न लौटा।
लोगों ने उसकी टूटी-फूटी माँ को समझाया—खोए हुए बेटे को भूलकर बाकी
बारह होनहार बच्चों पर ध्यान दो। किसी ने तो यह भी मशवरा दिया कि अफ़ीम खा ले, ताकि ग़म कम हो। लेकिन
कैसे लेती? उसे तो यक़ीन था कि लंबू ज़िंदा है, और एक दिन लौटेगा। यही यक़ीन उसके जीने का सहारा था, यही उसके वजूद का औचित्य।
पुलिस बिना लाश देखे मान सकती थी कि लंबू मर चुका है, मगर उसकी माँ ऐसा कैसे
मान लेती? वह तो सबसे बेदर्द और अ-मातृत्वपूर्ण सच्चाई होती।
माँ के लिए मातृत्व एक इबादत है—उम्र भर दर्द सहने की रीति, न
कि किसी भी बहाने त्याग देने की आतुरता।
जब भी घर में मटन-पुलाव पकता, वह माँ रो पड़ती—कभी खामोश आँसुओं में, कभी चीख़कर। वह बेटे का मासूम चेहरा याद करती रहती थी। फिर उसकी बेख़ौफ़
शरारतें भी आँखों के सामने आ जातीं—ज़हरीले साँप को नंगे हाथ पकड़ लेना, काँटों की झाड़ी में कूद जाना… और ये सब सिर्फ़ एक
लड्डू के लालच में। वह दूसरों पर इल्ज़ाम लगाती कि उन्होंने अपने भाई को इतनी
जल्दी भुला दिया। मगर जान-बूझकर किसी पर लंबू को छोड़ आने का आरोप न लगा सकी—वह
सोच भी नहीं सकती थी कि धरती पर कोई इतना जघन्य जुर्म कर सकता है।
लेकिन वक़्त ने उसे मजबूर किया, और बारह बरस बाद उसके मुँह से वह इल्ज़ाम निकल ही
गया।
उस दिन घर का माहौल बदला-बदला था—अचानक अजीब-सी हलचल। गाँव का नाई
पुजारी के पीछे-पीछे चल रहा था, और पूरा परिवार मिट्टी के बर्तन और पूजा-सामान लेकर
तालाब की तरफ़ बढ़ा। लंबू की माँ, जो अब बस हड्डियों का
ढाँचा रह गई थी, कुछ समझ न पा रही थी। दोपहर तक परिवार का ही
एक तेज़-तर्रार छोकरा राज़ उगल बैठा—यह सब लंबू की “विलंबित अंतिम क्रिया” के लिए
हो रहा था।
रिवाज है—अगर कोई आदमी बारह साल तक ग़ायब रहे और लौटकर न आए, तो आत्मा की शांति के
लिए यह संस्कार जरूरी है।
उस खुलासे ने बूढ़ी औरत के नाज़ुक जिस्म को झकझोर दिया। उसे मौन दिल
का दौरा पड़ा और वहीं दम तोड़ दिया। जब उसने आख़िरी साँस ली, सूरज डूबा न था, मगर तपिश उतर चुकी थी। पूरे घर में अजीब-सा मातमी सन्नाटा छा गया—जैसे
दीवारें भी साँस रोके खड़ी हों।
मरने से पहले, जब दुखों से टूटी औरत बुदबुदाई, तो बोली—“तुम सबने मेरे बेटे को ठुकरा दिया, और नारायण तुम्हारे लिए रहमदिल न होंगे…” नारायण, परमेश्वर!
जिन्होंने उसकी आख़िरी आवाज़ सुनी, वे श्रद्धा से भर उठे—
“वाह! क्या पाक-अंजाम था! दिन-दहाड़े भगवान का नाम लेकर
रुख़सत हुईं! अब तो सीधा वैकुंठ जाएंगी—जहाँ ख़ुद विष्णु भगवान इंतज़ार कर रहे
हैं। अमृत और सोम के लोक में सबकी दुलारी बनकर, चम्पा के
फूलों की छाँव में सदियों तक सुकून से रहेंगी।”
मैंने यह ढकोसला-सा अंतिम संस्कार तीन साल पहले देखा था। और आज, जब लंबू मुझे ख़्वाब में
दिखा, मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी—उसे गाँव वापस ले चलूँ।
लेकिन हाथ में और भी काम थे। एक बड़े दर्जे के शोधकर्ता ने मुझे एक
प्रोजेक्ट में शरीक होने का न्योता दिया था। उनका एक्शन-रिसर्च था—‘दिव्यांगों के
लिए इंसाफ़’, जो मेरी दिलचस्पी से पूरा मेल खाता था। और लंबू—वह भी तो उन्हीं में से एक
था। उसे बचाना ही असली एक्शन-रिसर्च होता।
“अरे लंबू, पहचानता है मुझे?
मैं हूँ करमवीर—तेरा पुराना यार!” मैंने भिखारी को आवाज़ दी।
“बाबू, एक रुपया दे दो… बहुत भूख
लगी है,” उसने वही जुमला दोहराया, जो
उसने पहली बार मुझे देखते ही कहा था। असल में, वह मुझे पहचान
ही न सका।
मैं पास गया, उसकी नाक के मस्से को छूआ और बाँह पर बना टैटू देखा।
नहीं, ये कोई धोखा न था। मैंने पुकारा—“चल लंबू, तुझे लड्डू खिलाता हूँ—मेरी तरफ़ से दावत!”
उसी पल दिमाग़ में बिजली-सी कौंधी—लंबू को तो लड्डू का चस्का हमेशा से
था! और देखो, वही दाँव काम कर गया।
ढाबे में बैठे लोग घूरने लगे—एक सड़क-छाप भिखारी और एक सलीकेदार आदमी, दोनों एक ही मेज़ पर!
मंज़र बड़ा अजीब था। मगर किसी के पूछने से पहले ही मैंने पूरी प्लेट लड्डू मँगाई
और इंतज़ार किया, जब तक लंबू सब चट न कर गया। फिर हम शहर
छोड़कर उसके गाँव की ओर चल पड़े।
रास्ते भर उसने मुझे तंग नहीं किया। जैसे मैं किसी जंगल से निकला हुआ
रहबर था, जो उसे सही राह दिखाने आया हो। शायद वह अतीत में डूबा रहा—कुछ कहे बग़ैर,
बस चुपचाप, भीतर ही भीतर।
गाँव में उसके रिश्तेदार आत्मा-शांति के बाद चैन की धूप सेंक रहे थे। उनके
हिस्से की ज़मीन-जायदाद बढ़ चुकी थी और सब बड़े-बड़े सपने देख रहे थे। ज़ाहिर है, जब लंबू सामने आया तो
उन्होंने उसे अपनाने से साफ़ इनकार कर दिया।
“ये सब क्या तमाशा है?” सबसे
बुज़ुर्ग चाचा ने बिगुल फूँका।
“चाचा, ये वही लंबू है… देखिए,
नाक का तिल!” मैंने विनम्रता से कहा।
“हुँह! तुम तो बहुत समाजसेवी लगते हो। कोई झूठा यतीम
हमारे सिर मढ़ने चले आए हो?” दूसरे चाचा ने भी पहले की बात
पर मुहर लगाई।
वह असहनीय हताशा का लम्हा था। लंबू को अपनाने से उनका इनकार मुझे
रडयार्ड किपलिंग की कहानी The Strange Ride of Morrowbie Jukes याद दिला दी—जहाँ चिता से
ज़िंदा लौटे लोग अपने घर नहीं जा सकते, बल्कि श्मशान के पास
गड्ढे में धकेल दिए जाते हैं, जहाँ वे कौवों की झूठन से पेट
भरते और सूखी घास पर सोते हैं।
इसी बीच, जब मायूसी मुझे पीछे धकेल रही थी, अंदर से एक औरत
बाहर आई।
“नमस्ते आंटी जी, मुझे आपकी मदद
चाहिए। देखिए इस बेचारे की बाँह पर क्या लिखा है—‘LAM’। याद
है, यही वो लड़का है जो टैटू बनाने वाले की सुई से बचने के
लिए घर से भागा था?”
वह औरत अंग्रेज़ी वर्णमाला नहीं जानती थी। मगर उस वक़्त यह मायने नहीं
रखता था कि कौन-सी ज़बान जानती है; अहम था बस ज़मीर की आवाज़ सुनना। पूरे खानदान की
नाराज़गी के बावजूद उसने ‘हाँ’ कह दिया।
परिवार ने अनमने मन से मान लिया। मगर अपनाएँ कैसे? आख़िर तीन साल पहले उसका
श्राद्ध कर चुके थे। अब यह कौन लौट आया? उनके लिए तो यह
आवारा रूह थी—जैसे किपलिंग की कहानी हक़ीक़त में उतर आई हो।
आख़िरकार, सबने ठान लिया कि अब लंबू मेरे पास ही रहेगा। मुझे
उसका पुनर्वास करने की ज़िम्मेदारी दी गई और तीन सौ रुपये भी थमा दिए गए।
मैं हक्का-बक्का रह गया। तभी एक चाचा ने तंज कसा—“अरे भाई, इसमें क्या कमी है? सिमलिपाल टाइगर रिजर्व में कोई
ट्रक वाला पगला उतारने के बस दो सौ लेता है। तुम्हें तो सौ रुपया ज़्यादा मिला—इसे
ढूँढ़ निकालने का मेहनताना समझ लो! अब और क्या चाहिए?”
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अपना ख़्वाब सुनाने के बाद आरोहण एकदम ख़ामोश हो गया। फिर उसका चेहरा
सिकुड़ा और वह तकिए में मुँह छुपाकर सुबकने लगा।
अब सपनों और हक़ीक़त का रिश्ता और भी साफ़ होता जा रहा था। क्या ये बस
तसव्वुर था? या फिर सिमलिपाल के जंगल में लंबू के निर्वासन की बात कहकर, स्वप्नद्रष्टा आरोहण कर्नाटक के टाइगर रिज़र्व में अपने ही निर्वासन का
इशारा कर रहा था? क्या अपने कुछ जागृत चेतना के लम्हों में
उसने अतीत को याद करना शुरू कर दिया था?
निस्संदेह, लगता था जैसे आरोहण ने दिल-ओ-दिमाग़ पढ़ने की काबिलीयत
हासिल कर ली हो। कुछ दिन पहले ही इर्विंग ने मयंक को मशविरा दिया था कि वह आरोहण
को इलाज के लिए माउंट हैरियट की मुनिनुमा सन्यासिनी, मानसी
सुंदरी, के पास ले जाए। और जल्द ही, आरोहण
ने एक सपना देखा—जिसमें ‘सुंदरी कुमारी’ नाम की औरत उसे सम्मोहित करके अपना
अनुयायी बना लेती है। क्या वह ख्वाब वाली सुंदरी कुमारी वही मानसी सुंदरी थी?
यदि हाँ, तो फिर आरोहण ऐसा ख्वाब देख भी कैसे
सकता था? उसे तो मयंक और इर्विंग की गुफ़्तगू की भनक तक नहीं
थी!
ठीक इसी तरह, एक और ख़्वाब में उसने जान लिया कि मयंक—जिसे उसने
‘इंस्पेक्टर दौलत राम’ का चेहरा दिया—‘बॉम्बे ओएच’ जैसे नायाब रक्त-समूह का मालिक
है। ये कैसे मुमकिन हुआ? शायद आरोहण की अतींद्रिय प्रक्रिया
उसी रहस्यमय दृश्य से मिलती-जुलती थी, जिसमें जंगल से आया
“पराया आइबो”—उसका अल्टर ईगो—असली आइबो की शख़्सियत में समा गया और उसे फिर से
मुकम्मल बना दिया। यह किसी “आत्मा-प्रवेश” जैसा अनुभव था, और
मयंक ने अपनी आँखों से इस दृश्यात्मक प्रक्रिया को देखा था।
मगर एक गुत्थी बाक़ी थी। उसके सपनों के तमाम किरदार और वाक़ियात
हू-ब-हू हक़ीक़त से मेल नहीं खाते थे। कभी नाम बदल जाते हैं—जैसे उलट-पलट कर
अनाग्राम यानी वर्ण विपर्यास बनाए गए हों। कभी घटनाओं का सिलसिला उलझकर बेतरतीब हो
जाता है। फिर भी उनमें इतना कुछ मेल खाता, गूँजता और आने वाले वाक़यों की झलक देता कि
नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन था। कभी पोर्ट ब्लेयर का सफ़र पहले से दिखा देता,
तो कभी ऐसी हक़ीक़तें उजागर कर देता जिनसे दुनिया बेख़बर थी—जैसे
मयंक का अपनी एक किडनी बेचना। मगर सपने में उसने यह दौलत राम को करते देखा। तो
क्या इसका मतलब था कि आरोहण का ख़ून भी उतना ही दुर्लभ है? मयंक
को याद आया कि नेतरहाट हाई स्कूल में हुए टेस्ट में उसका ग्रुप ‘O+’ निकला था। मगर अब यक़ीन की कोई ठोस वजह न बची थी।
यही शक सबसे पहले मिटाना ज़रूरी है, मयंक ने सोचा। उसे अब आरोहण का ब्लड टेस्ट दोबारा
करवाना चाहिए और दोनों किडनियों की हालत की भी तस्दीक करनी चाहिए। कुछ दिन पहले,
जब आरोहण कपड़े बदल रहा था, मयंक ने चोरी-छिपे
उसके जिस्म को देखा था—कहीं ऑपरेशन का निशान नहीं था। यानी उसकी नासमझी का फ़ायदा
उठाकर किसी ने अंग चोरी नहीं किया था। लेकिन फिर भी, अगर
सपने में दौलत राम मयंक का हमशक्ल नुमाइंदा था और उसके पास सिर्फ़ एक ही किडनी थी,
तो ऐसा ख़्वाब क्यों आया?
हर बार जब आरोहण ख़्वाब सुनाता, उसके भीतर जज़्बातों का तूफ़ान उठ खड़ा होता। एक बार
उसने बचपन की बेबसी और टाटानगर में नौकरी न पाने की नाकाम कोशिश का ज़िक्र कर,
दबी हुई सिसकी छोड़ी थी। और आज, दूसरी दफ़ा,
वह फूट पड़ा। क्यों? क्या अनजाने में वह अपने
ग़मों को उजागर कर देता था, जिन्हें वह होश में बयान करने की
हिम्मत नहीं जुटा पाता?
एक बात साफ़ थी—हर ख़्वाब में वह ठगा जाता, धोखा खाता, छोड़ा जाता, इल्ज़ाम झेलता, ज़लील
होता, ग़लत समझा जाता… यहाँ तक कि एक बंदर ने भी उसे थप्पड़
जड़ दिया था। हर बार, वह हारा हुआ किरदार ही बनकर उभरता।
क्यों?
अब दोनों दोस्त ख़ामोश और होश में थे। बाहर की रोशनी से कोई परहेज़
नहीं था। मयंक ने परदे खींच दिए ताकि बंगाल की खाड़ी का सुकूनदेह नज़ारा कमरे की
उदासी को हल्का कर सके। शाम के चार बज चुके थे। उसने सोचा, थोड़ी देर बाहर टहल सकते
हैं। मगर पहले उसे अपने यार को दिलासा देना था, जो अब भी
तकिए में मुँह छुपाए पड़ा था।
मयंक उसके पास गया। वह तसल्ली देना चाहता था—बिना यह जताए कि सपने के
किसी किरदार के लिए रोना निरर्थक है।
हे भगवान! आरोहण को तो बुख़ार है। वह बुरी तरह बीमार, मगर उसने आह तक न की!
मयंक ने उसका बदन छूआ तो पहला ख़याल आया—उन्हें इतनी शराब नहीं पीनी चाहिए थी। मगर
अगले ही पल उसने खुद को समझाया—बुख़ार तो परहेज़गार को भी नहीं छोड़ता। आरोहण ने
कहा कि पेट में हल्का दर्द भी है। अब तो तुरंत जाँच जरूरी थी।
डॉक्टर आ पहुँचा। उससे पहले ही लैब टेक्नीशियन खून का सैंपल लेने आ
गया। आरोहण ने बिना चूँ-चपड़ सुई चुभवा ली। शुक्र था कि सपनों वाले लंबू की सुई से
डरने की आदत हक़ीक़त में नहीं उतरी थी। डॉक्टर ने कहा, फ़िक्र की कोई बड़ी बात
नहीं है, लेकिन आगे की जाँचें ज़रूरी होंगी—ख़ासतौर पर
अल्ट्रासाउंड।
जाते-जाते डॉक्टर ने मुस्कुराकर छेड़ा—“आज रात कोई ‘नाइट कैप’ नहीं, समझे?” और आरोहण ने भी हल्की मुस्कान के साथ उसकी बात का जवाब दिया।
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By
Ananta Narayan Nanda
Bhubaneswar / 12-09-2026
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Labels: Hindi stories, चेतना की खोज




