The Unadorned

My literary blog to keep track of my creative moods with poems n short stories, book reviews n humorous prose, travelogues n photography, reflections n translations, both in English n Hindi.

Sunday, February 01, 2026

कौन था वह?

 


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The post constitutes the Hindi version of a chapter in my novel, "Ivory Imprint". Very soon - maybe in a month's time - I'll finish translating the novel from its original English version into Hindi and that will appear under the title "चेतना की खोज". I have also posted the original version of this chapter in this blog, just a moment ago, and its title is "To Exorcise or NotHope my readers will like my efforts and encourage me.

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कौन था वह?

मयंक गहरी नींद में था, जब अचानक उसे एहसास हुआ कि कुछ उसकी छाती पर भारी पड़ रहा है और उसकी टाँगें मानो लकड़ियों के ढेर तले दब गई हों। उसने आँखें खोलीं तो देखा कि आरोहण अपनी जगह छोड़कर उसकी ओर लुढ़क आया है और अपने पाँव उसके ऊपर जमा दिए हैं। इसी वजह से वह खुद को पूरी तरह जकड़ा हुआ महसूस कर रहा था।

इसके अलावा, आरोहण की मुट्ठियाँ कसकर भींची हुई थीं; सिर एक ओर से दूसरी ओर डोल रहा था। वह तेज़-तेज़ साँसें भर रहा था और कुछ कहने की जद्दोजहद कर रहा था, जबकि उसकी आँखों की पुतलियाँ अजीब ढंग से घूम रही थीं। तभी अचानक उसने आँखें खोल दीं।

क्या हो गया तुझे, आरोहण? तुझे तो जैसे दौरा-सा पड़ रहा था। सपना देखा क्या?” मयंक ने हैरानी से पूछा।

सपना… हाँ, देखा तो था,” आरोहण ने उनींदे लहजे में कहा, “लेकिन ये दौरे-वौरे की बातें क्यों, भाई? मैं तो बस सोच रहा था कि मेरे लैपडॉग आइबो के उस हमशक्ल का क्या करूँ।”

मयंक हल्के से मुस्कराया। उसे मालूम था कि लोग नींद में बहुत कुछ कर बैठते हैं—कभी बकबक करना, कभी उठकर चलना, कभी कॉफ़ी बना लेना, और तो और दोस्तों की लॉकर से चुपके-चुपके बिस्कुट चुरा लेना—ये सब ग़फ़लत में हो जाता है।

आरोहण अब पूरी तरह उत्साहित था। "सुन ले मेरा ख़्वाब, भाई, नहीं तो भूल जाऊँगा," उसने इसरार करते हुए कहा।

मयंक, जो अब क़ैदी श्रोता बन चुका था, बोला, "मैं कान लगाकर सुन रहा हूँ, आरोहण, बोलते जाओ।"

हालाँकि वक़्त तो दोबारा नींद में लौट जाने का था, लेकिन मयंक अब भी यही आस लगाए था कि आरोहण का यह ताज़ा ख़्वाब शायद उसके अतीत पर कुछ रौशनी डाल दे। दरअसल, इतने सपने सुन लेने के बावजूद, जिनमें से ज़्यादातर का कोई सिर-पैर नहीं निकलता था, मयंक मन ही मन यही चाहता था कि यह सिलसिला तब तक चलता रहे—जब तक आरोहण के पास सपनों का ज़ख़ीरा बाक़ी है, या कम से कम तब तक, जब तक उसे अपने दोस्त की ग्यारह बरस की ग़ैरहाज़िरी का कोई ठोस सुराग न मिल जाए।

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आधी रात को किसी सुनसान जंगल से गुज़रना सचमुच दिल दहला देने वाला तजुर्बा होता है। सूखे बाँसों की आपसी रगड़ से उठती किरकिराती आवाज़ किसी चुड़ैल की चीख़ जैसी डरावनी लगती है। राह के किनारे उगी कोई मामूली झाड़ी भी ऐसे मालूम पड़ती है, मानो कोई बदनुमा साया एड़ियों के बल घात लगाए दुबका हो। पत्तों की सरसराहट से दिल में यह वहम जगता है कि कोई दबे पाँव पीछे-पीछे आ रहा है। झींगुरों की कराह, मेंढकों की टर्राहट, दरिंदों की दहाड़ और उल्लुओं की हूटिंग—ये सब मिलकर किसी भी शख़्स के होश उड़ा देने के लिए काफी हैं, जो उनकी भुतही दुनिया में क़दम रखने की जुर्रत कर बैठे। ऐसे माहौल में, एक छोटे बच्चे या किसी पालतू कुत्ते की सोहबत भी जंगल पार करने का सहारा लगती है। आधी रात का जंगल वाक़ई इतना खौफ़नाक हो सकता है!

मैं अभी-अभी अपनी जंगली मुहिम से लौटा हूँ। आह, सोचता हूँ तो लगता है—क्या अजीबो-ग़रीब रात थी!

मैं फ़ुलबाणी की ओर जा रहा था, जो कंधमाल ज़िले का सदर-मकान है। रास्ते में कलिंगा के एक सरकारी विश्रामगृह में ठहरने का फ़ैसला किया। वह जगह "कउरी जिरा" नाम के एक घने वर्षावन के क़रीब थी।

कउरी जिरा की शान-ओ-शौकत के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था—साँस रोक देने वाली, दिल मोह लेने वाली, मानो सारी जादूगरी वहीं आकर समा गई हो। वहाँ की भोर की ख़ामोशी वसंत की महकती ख़ुशबू में घुलकर दिल को मदहोश कर देती है। झाड़ियाँ अपारगम्य नहीं थीं; उनकी सलीक़ेदार बनावट चितकबरे आसमान-सी लगती थी—न कि किसी समंदर किनारे बिखरे कूड़े-कचरे की तरह बेतरतीब। जंगल में साल के पेड़ हर तरफ़ सलीके से खड़े नज़र आते थे, और उनके तनों के चारों ओर फैली साफ़-सुथरी ज़मीन पहली ही नज़र में दिल लुभा लेती थी। वे पेड़ सचमुच जंगल के बादशाह मालूम होते थे—उनकी ऊँची छतरियाँ जितनी दिलकश थीं, ज़मीन भी उतनी ही करीने से सजी हुई थी।

वैज्ञानिक सोच और आदिवासी विकास”—यही मेरे शोध का विषय था। योजना थी कि निष्कर्षों को किस्तों में प्रकाशित करूँ और उसके साथ-साथ एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाऊँ। इलाक़े के कुछ समाजसेवियों से बातचीत का इरादा भी था, जो अंधविश्वास और डायन-प्रथा के ख़िलाफ़ लगातार जद्दोजहद कर रहे थे।

अप्रैल की एक सुकून-भरी शाम थी, जब मैं उस सरकारी विश्रामगृह पहुँचा। उफ़! पिछले बारह घंटे से बिजली ग़ायब थी। केयरटेकर ने बताया कि अगले अड़तालीस घंटे तक आने की कोई उम्मीद नहीं। मजबूरन, मैंने उस रात की असुविधा सह लेने का मन बना लिया।

मगर अजीब बात यह थी कि मेरा पालतू आइबो—लाल रंग का निडर पोमेरेनियन—ज़रा भी परेशान न था। वह अपने मालिक की क़ाबिलियत जानता था, और शायद इसी वजह से बेफ़िक्र भी था। बल्कि वह तो खेलने के मूड में दिख रहा था। उसके अंदाज़ से लगता था मानो कह रहा हो, “ये छोटी-मोटी तकलीफ़ें तो आती-जाती रहती हैं; मैं तो अब किसी साहसिक मुहिम की तैयारी में हूँ!”

उस जगह की मिट्टी की भीनी ख़ुशबू और सुकून भरा माहौल मुझे भी छोटी-छोटी फ़िक्रों से आज़ाद कर गया। जैसे मेरा फुर्तीला पालतू हर नए मोड़ पर उत्साह से उछल पड़ता है, वैसे ही मैंने भी उम्मीद की डोर थाम ली। कउरी जिरा की झाड़ियों के बीच शायद मेरी तहक़ीक़ात को नई दिशा मिल जाए—कहीं कोई भूली-बिसरी डायन की गुफ़ा या उसका जादुई असबाब हाथ लग जाए! एक स्थानीय बाशिंदा, जो उस ज़मीन से भली-भांति वाक़िफ़ था, सहर्ष गाइड बनने को राज़ी हो गया। उसका कहना था कि लोग उसके तजुर्बे से फ़ायदा उठाएँ। कुल मिलाकर, यह सफ़र यादगार बनने ही वाला था।

कउरी जिरा” नाम में एक अजीब-सी तुकबंदी थी। मैंने पूछा—क्या इस नाम का कोई मतलब है? गाइड, जो जानकारी देने को काफ़ी उतावला था, बोला, “मायने हैं, हुज़ूर—वो जंगल जहाँ पुराने ज़माने में भैंसे ग़ायब हो जाया करते थे!” यह तफ़सीर बड़ी दिलकश और प्यारी लगी—किसी ‘शैतान की गुफ़ा’ या ‘वीरान बीहड़’ जैसी डरावनी नहीं।

हमने तय किया कि अगली सुबह निकलेंगे। हमारी छोटी-सी टोली थी—मैं, गाइड और आइबो। आइबो—वो निडर मुसाफ़िर—जोश से लबरेज़ था; गाइड, तजुर्बेकार होते हुए भी, भूत-प्रेत और उनकी नस्लों की कहानियों में डूबा रहता था। मुझे डर था कि कहीं यह सफ़र मिडनाइट्स चिल्ड्रेन” की तरह न हो जाए, जहाँ सलीम और उसके दोस्त सुंदरबन में भटक जाते हैं। मगर गाइड का दावा था कि वो सिर्फ़ हवा की ख़ुशबू सूंघकर रास्ता पहचान लेता है! आइबो ग़ौर से हमारी बातचीत सुन रहा था—उसकी हिलती पूँछ उसकी रज़ामंदी का सबूत थी। इतना खुश नज़र आ रहा था कि मानो अभी मुँह खोलकर कह दे: सुनिए मालिक, मैं तो बेहद रोमांचित हूँ! अगर आप किसी वजह से नहीं गए, तो मैं अकेले ही निकल पड़ूँगा।” इत्मिनान से वो आराम करने चला गया।

शाम की नाश्ता और एक सिगरेट के बाद, मैं गाइड से थोड़ी देर और गुफ़्तगू करता रहा। दिलचस्पी ऐसी थी कि बार-बार वही सवाल दोहरा देता:

क्या रास्ते में कोई रीछ हमें घात लगाकर दबोच सकता है?”

नहीं, हरगिज़ नहीं!” गाइड ने तसल्ली दी। “भालू रात तक अपनी मांद से बाहर नहीं निकलते।” फिर भी, एहतियातन हमने तय किया कि सुबह थोड़ा देर से निकलेंगे और दोपहर के खाने से पहले ही लौट आएँगे।

अब रात के सवा दस बज चुके थे और मेरी गाइड से गुफ़्तगू मुकम्मल हो चुकी थी। मैं फौरन उस छोटे कमरे की ओर दौड़ा, जहाँ आइबो ठहरा हुआ था और अपनी रोज़ाना की रात की सैर के लिए बेसब्री से मेरा इंतज़ार कर रहा था। यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। आम तौर पर अगर उसकी दिनचर्या में बिना रज़ामंदी के कोई तब्दीली हो जाती, तो वह बेचैनी में कूँ-कूँ करने लगता।

लेकिन आज अजीब सन्नाटा था—हालाँकि हम काफ़ी देर कर चुके थे। मगर आइबो था कहाँ? यह कोई वक़्त नहीं था कि वह अपने-आप बाहर निकल जाए। वह कोई आवारा नस्ल का थोड़े ही था!

"आइबो, ओ मेरे मनमौजी, मेरे शहज़ादे आइबो!" मैं पागलों की तरह बग़ीचे के पिछवाड़े में उसे ढूँढने लगा। जवाब सन्नाटे का मिला। मैंने बग़ीचे के हर कोने को छान डाला—यहाँ तक कि उन छोटी-छोटी झाड़ियों में भी, जहाँ आइबो खेलना पसंद करता था। लेकिन सब बेकार।

भटकना आइबो के मिज़ाज में कभी शामिल नहीं था। हाँ, उसने जीनिया की क्यारी को इस कदर खोद डाला था कि अंकुर फूटने की गुंजाइश ही नहीं बची, अब तक मज़े से आधा दर्जन तकिए फाड़ डाले, आँगन के हर चमेली के पौधे पर लघुशंका कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, और शैंकी नाम की बिल्ली से बेवजह झगड़ा मोल लिया। लेकिन अपने मालिक की हद पार कर बाहर आवारागर्दी करना—ये उसकी आन-बान-शान के ख़िलाफ़ था। तो फिर गया कहाँ? और वह भी इस अजनबी जगह में?

मेरी बेताब पुकार सुनकर केयरटेकर दौड़ा आया, मगर कोई कारगर जानकारी न दे सका।

"हुज़ूर, यहाँ विश्रामगृह में कोई नहीं है जो आपके कुत्ते को चुरा ले!" उसने मेरे अनकहे इल्ज़ाम का जवाब देते हुए कहा।

अब चाहे आइबो नासमझी में कहीं निकल गया हो या किसी चोर की नज़र का शिकार हो गया हो, हमें तो बिना सिरा पाए तलाश शुरू करनी थी। मंज़िल: कउरी जिरा। ग़नीमत थी कि गाइड अब तक गया नहीं था, सो हमने फ़ौरन रात्रिकालीन तलाश का इरादा कर लिया।

मैं टॉर्च साथ लाना नहीं भूला, जबकि गाइड ने लोहे से मढ़ी हुई लाठी उठाई—यानि उसके निचले सिरे पर लोहे की चप्पी चढ़ी थी, ताकि ज़मीन पर टिकाऊ रहे और जल्दी न घिसे। ऊपर से, उसका यक़ीन था कि लोहे को छू लेने से भूत-प्रेत और उनके तमाम कुनबे से बचाव हो जाता है। उसके पास नमक की एक छोटी पोटली भी थी—कहता था, यह सबसे सख़्त रूहों को भी डराने के लिए काफ़ी है।

हमने जल्द ही तक़रीबन एक किलोमीटर का फ़ासला तय कर लिया। रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था और बड़े-बड़े पत्थरों से अटा पड़ा था। मैंने आइबो को पुकारा, मगर कोई जवाब न आया—सिर्फ़ मेरी आवाज़ थी, जो जंगल की ख़ामोशी में गूँजकर लौट रही थी। मेरी टॉर्च की रोशनी गहरे अंधेरे के सामने पस्त पड़ती जा रही थी, और मुझे ऐसा लगने लगा मानो मैं किसी कोयले की खान में भटक रहा हूँ, जहाँ मेरी एकमात्र रोशनी किसी भी पल बुझ सकती है।

हम बीस मिनट और बढ़े और एक ऐसे मोड़ पर पहुँचे, जहाँ रास्ता दो हिस्सों में बँट गया। आइबो किसी भी राह पर निकल गया होगा, मगर उसका कोई सुराग नहीं था। आख़िरकार हमने अलग-अलग दिशाओं में तलाश का फ़ैसला किया—गाइड बाएँ मुड़ा और मैं दाएँ।

पाँच मिनट भी नहीं गुज़रे थे कि गाइड के क़दमों की आहट जंगल में कहीं गुम हो गई। अब मैं बिल्कुल अकेला था। आइबो को पुकारता रहा, मगर डर भीतर ही भीतर पहाड़ की तरह बढ़ता चला गया। न मेरे पास गाइड की लोहे से मढ़ी लाठी थी, न भूत-भगाने वाला नमक। अब तो मेरी अपनी आवाज़ ही मुझे खौफ़नाक लगने लगी थी—उसकी गूँज मेरी रीढ़ में कभी तपिश, कभी ठंडी लहर दौड़ा देती। नतीजा यह हुआ कि मेरे क़दमों की रफ़्तार भी डगमगाने लगी।

अचानक मेरी दाहिनी ओर कुछ सरसराता हुआ गुज़रा—सूखी पत्तियों की मोटी परत को चीरता हुआ। मेरी टॉर्च की रोशनी इतनी कमज़ोर थी कि मैं साफ़-साफ़ देख न पाया।
शायद कोई लोमड़ी या खरगोश होगा,” मैंने अपनी दहशत दबाने की कोशिश की और आगे बढ़ गया।

थोड़ी ही देर में कुछ सौ क़दम दूर किसी जानवर के खर्राटे सुनाई दिए। मैं ठिठक गया। टॉर्च की रोशनी चारों तरफ़ घुमाई, मगर नतीजा सिफ़र ही रहा। किसी भालू के अचानक सामने आ जाने का ख़याल आते ही मैं काँप उठा। आँखें बंद कर हिम्मत बटोरने की कोशिश करने लगा।

पास ही एक पानी का गड्ढा था, जिसमें न कोई धारा मिलती थी, न कोई निकलती थी। मैंने उधर नज़र डाली—कुछ दिखाई न दिया। मगर दूसरी बार देखा तो टॉर्च की रोशनी अचानक तेज़ हो उठी।

और वहाँ क्या था?

अरे! वहाँ आइबो था—एक चट्टान पर बैठा, खुद में सिमटा हुआ। बेचारा बेहद परेशान मालूम पड़ रहा था; पेट खाली, जान पूरी तरह थक चुकी थी। क्लांति और निढालपन उसके जिस्म से टपक रहा था। शुद्ध नस्ल के कुत्ते अक्सर ऐसे ही होते हैं—मैंने खुद को तसल्ली दी—अपने अज़ीज़ों से जुदाई वो सह नहीं पाते। उसने मुझे ऐसे देखा, मानो हमारे पुराने रिश्ते की डोर याद करने की कोशिश कर रहा हो।

मैंने उसे नर्मी से गोद में उठाया और वापसी की राह पकड़ ली। उसका जिस्म ठंडा था, लेकिन उसने अपना सिर मेरी बाँह के नीचे छुपा लिया। इससे मुझे हल्की-सी गुदगुदी भी हुई और क़दमों की लय भी लौट आई। अंधेरे, वीरान जंगल का खौफ़ जैसे धीरे-धीरे पिघलने लगा।

अब मुझे अपने गाइड को इत्तला देनी थी। जहाँ हम जुदा हुए थे, वहाँ पहुँचने में तक़रीबन आधा घंटा लग गया, लेकिन गाइड अब तक लौटा न था।

"आइबो यहाँ है!"—मेरी तरफ़ से ज़ोरदार पुकार थी, मगर कोई जवाब न आया। आधी रात बीत चुकी थी, और जंगल हर पल और ज़्यादा सीलन भरा, बेचैन करने वाला लगता जा रहा था। आइबो भी बेक़रार हो उठा।

वो मेरी गोद से कूद पड़ा और बिना पीछे देखे चल पड़ा। हैरत होती है कि एक पालतू जानवर भी इतना गृहातुर हो सकता है!

मैं भी उसके पीछे-पीछे विश्रामगृह पहुँचा। वह सीधे कमरे के कोने में बने अपने छोटे-से बिस्तर की तरफ़ बढ़ा। अरे बाप रे! वहाँ आइबो पहले से मौजूद था—अपने ही बिस्तर पर इत्मिनान से सोता हुआ। तो फिर जिसे मैं पानी के गड्ढे से उठा लाया था, वह कौन था? क्या वह मेरा वही “गुडी-मूडी आइबो” नहीं था? मेरी हैरानी की कोई हद न रही।

मैंने दोनों जीवों को बारी-बारी से देखा। दोनों हूबहू एक जैसे थे—एक ही क़द-काठी, वही रंग-रूप, वही बालों की घनता और वही चमकती नाक। उनमें फर्क करना नामुमकिन था। अंजाना डर फिर से पूरे ज़ोर-ओ-शोर के साथ लौट आया। मैं सिर से पाँव तक काँप उठा; जिस्म का हर रोम खड़ा हो गया। चीख़ना नामुमकिन था—गला सूख चुका था। बस एक धीमी, लगभग अनसुनी सिसकी ही निकल पाई।

कउरी जिरा से आया आइबो मेरी तरफ़ झुंझलाकर घूरने लगा। उसकी आँखों में शुद्ध शैतानियत चमक रही थी। फिर उसने नज़र फेर ली और पुराने आइबो की तरफ़ देखा। धीरे-धीरे वह उसकी ओर बढ़ा—पूरी तरह इत्मीनान के साथ, बिना डरे, बिना पीछे हटे। एक कुत्ता दूसरे कुत्ते के इतने क़रीब पहुँचे—वह भी बिना झगड़े के—यह अपने आप में ग़ज़ब का मंज़र था। शायद कुत्तों की दुनिया में कोई नई तहज़ीब चल पड़ी हो!

अचानक उसने अपने चारों तरफ़ बेइंतहा तेज़ी से घूमना शुरू किया। फिर वह हवा में उठा और असली आइबो में जा समाया—मानो किसी धूम्रपान करने वाले के सिर के ऊपर धुएँ का गोल छल्ला बन गया हो। जैसे कोई छोटा बुलबुला बड़े बुलबुले में समाकर अपनी पहचान पूरी तरह ग़ायब कर दे। कुछ ही पलों में आइबो गहरी नींद में डूब गया—जैसे कुछ हुआ ही न हो।

इतने में केयरटेकर हड़बड़ाकर दौड़ा आया। "माफ़ कीजिए हुज़ूर, आपको बेवजह बाहर जाना पड़ा। आइबो तो यहीं था। आपके निकलने के थोड़ी ही देर बाद अपने बिस्तर पर सोता मिला।"

उसी वक़्त गाइड भी आ पहुँचा। मुझे देखकर वह खुश हुआ और आइबो को उसके बिस्तर पर देखकर और भी आश्वस्त

"सर, कहाँ मिला वो?" गाइड ने ताज्जुब से पूछा।

मैं दोहरे आइबो की अजीबो-ग़रीब दास्तान सुनाने ही वाला था कि केयरटेकर बीच में बोल पड़ा, "अरे चाचा, आइबो तो यहीं था। आप लोगों के जाते ही थोड़ी देर बाद अपने बिस्तर पर पड़ा मिल गया।"

इस तरह, मैं न तो किसी को ये क़िस्सा सुना सका, न ही इस वाक़ए का कोई माक़ूल जवाब ढूँढ पाया। अगर मुँह खोलता, तो लोग मुझे टोने-टोटके में फँसा कोई बेवक़ूफ़ समझते। और हाँ, मुझे दोगला तर्कवादी भी कहते—वो पाखंडी जो हर वक़्त वैज्ञानिक सोच का राग अलापता फिरता है।

अब मुझे किसी से तसल्ली चाहिए थी। कौन कह सकता है कि वो कुत्ता कोई भूत-प्रेत या वेयरवुल्फ, यानी भड़मानस, का रूप न हो? मगर असली सवाल तो यही था—क्या अब मुझे किसी ओझा को बुलाना चाहिए?

***      ***      ***      ***      ***

यही सब मेरे ख़्वाब का हिस्सा था, और फिर अचानक नींद टूट गई।”—आरोहण ने फ़िल्मी ठाठ से कहा।

मयंक को यह क़िस्सा बेहद दिलचस्प लगा, मगर फिर वही पुराना सवाल सामने आ खड़ा हुआ: आख़िर वह अपने दोस्त के ख़्वाब और हक़ीक़त के बीच तालमेल कैसे बिठाए? एक कुत्ते का दूसरे में समा जाना जितना मज़ाक़िया लगता था, उतना ही गहरी अहमियत भी रखता था। क्या यह इशारा था कि अब आरोहण को वह क़ाबिलियत मिल चुकी है—अपने यार के दिल-ओ-दिमाग़ में झाँकने की, और किसी नाज़ुक रूहानी सतह पर ख़ुद को वहाँ पहुँचा देने की?

सुबह के छह बज चुके थे, और आरोहण फिर से गहरी नींद में डूब चुका था। मयंक उसकी साँसों की उतार-चढ़ाव भरी लय महसूस कर रहा था। पिछली शाम होटल के एक मुलाज़िम ने उसे बताया था कि सड़क के पार रेसकोर्स नाम का एक बेहतरीन वॉकर ट्रैक है, जहाँ सुबह-सुबह सैकड़ों सेहत-प्रेमी जमा होते हैं। मयंक की उड़ान 11 बजे थी, इसलिए उसने सोचा कि क्यों न एक छोटी-सी सैर के लिए वक़्त निकाला जाए।

ढाई किलोमीटर लंबे, हरे-भरे गोल ट्रैक पर टहलते हुए मयंक ने जेब से वह काग़ज़ी रोल निकाला, जो उसे वालपारई में आरोहण के कमरे से मिला था। सावधानी से खोलते ही उसमें से एक रेलवे टिकट निकला—नीलगिरि माउंटेन रेलवे का—जिसमें 26 जनवरी 2012 को ऊटी से मेट्टुपालयम की यात्रा दर्ज थी।

मयंक का क़दम ठिठक गया। इसका मतलब था कि उस दिन आरोहण दिमाग़ी तौर पर बिल्कुल सही-सलामत था… या फिर किसी और ने उसके लिए यह टिकट ख़रीदा था। मगर क्यों? किसने? और किस मंसूबे से?

एक पल के लिए उसके ज़हन में ख़याल कौंधा—शायद किसी देशभक्त हिन्दुस्तानी ने मदद की नीयत से, गणतंत्र दिवस पर, उसके लिए यह टिकट ले दिया हो। मगर यह संभावना उतनी ही जल्दी धुंधली हो गई, जितनी तेज़ी से आई थी। मयंक को याद ही नहीं आ रहा था कि क्या आरोहण कभी नीलगिरि की वादियों में गया भी था। और अगर गया भी, तो पहुँचा कैसे—जबकि सब जानते थे कि उस वक़्त वह दिमाग़ी तौर पर अस्थिर था।

तिरुपति यात्रा के दौरान वह अपने दो चाचाओं और चाची के समूह से बिछुड़ गया था। तो फिर कौन था जिसने उसे ऊटी तक पहुँचाया? और किसने नीलगिरि माउंटेन रेल की उस ठंडी, धुंध में डूबी सुबह उसकी यात्रा मुकम्मल कराई?

अब मयंक के दिल में यह एहसास गहराई से जम चुका था—जो सुराग अभी-अभी हाथ आया है, वह इस रहस्य का दरवाज़ा खोल सकता है… या फिर किसी और बड़े, अनदेखे भँवर में उसे खींच सकता है।

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By

अनन्त नारायण नन्द 

भूबनेश्वर 

दिनांक - 1-2-2026

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Wednesday, December 31, 2025

खोई स्मृति, पाई कहानी

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खोई स्मृति, पाई कहानी

मयंक जब गेस्ट हाउस लौटा, तब तक साँझ ढल चुकी थी। आरोहण गहरी नींद में पड़ा था। वह खुश हुआ—“चलो, दोस्त को चैन की नींद तो मिली!”

सिर्फ़ एक रात की सुकून भरी नींद ने ही उसे इतना सँभाल दिया था कि वह तीन शब्द—या कहें, दो पूरे वाक्य—बोल पाया। मगर थोड़ी ही देर में मयंक का कलेजा धक् से रह गया। आख़िर दोपहर की झपकी भला इतनी लंबी कैसे हो सकती है कि शाम ढल जाए? उसने मन ही मन कहा—देखे बिना चैन नहीं मिलेगा।”

कमरे में घना अंधेरा था। पर्दों ने धूप को ऐसे निगल लिया था जैसे अजगर शिकार को। दीवार टटोलकर जब बत्ती जलाई तो जो नज़ारा सामने आया, उससे मयंक का दिल बैठ गया। आरोहण फर्श पर यूं पसरा था, जैसे बच्चा रो-धोकर थक कर ढेर हो गया हो। मंज़र आधा मज़ेदार, आधा डरावना। मयंक झट पास पहुंचा और माथा छुआ—खरबूजे जैसा ठंडा।

क्या हुआ रे तुझको, आरोहण? ज़मीन पर काहे लोटा पड़ा है?”

यह ठंडा है,” उसने धीमे स्वर में कहा।

मयंक हक्का-बक्का रह गया। शुक्र है कि कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई और ऊपर से दोस्त ने साफ़ जवाब भी दिया।

तोरा कुछ याद पड़ता है? तू इस वीराने में कैसे आ धमका?” मयंक ने झिझकते हुए पूछा।

आरोहण कौन है?”—उसने आँखें मलते हुए कहा। अब वह पूरी तरह जाग चुका था। माथे की सिलवटें साफ़ बता रही थीं कि वह चालाकी नहीं कर रहा, बल्कि सच्चाई जानना चाहता है।

अरे, तू ही आरोहण है, और मैं मयंक। बचपन से साथ खेल-खेलकर बड़े हुए।” मयंक ने वही दोहराया जो सुबह कहा था। आरोहण ने सिर वैसे ही हिलाया जैसे कोई अनसुनी बात सुनकर उलझ जाए—और फिर बस दो लफ़्ज़ बोले: “पता नहीं।”

मयंक ने लंबी साँस ली—“अजीब पेंच है! कभी लगता है कोई सुनियोजित चाल है, कभी महज़ इत्तफ़ाक़ों का खेल।”

तभी आरोहण बोला—“मैंने अभी सपना देखा।”

मयंक का बुझा हुआ चेहरा जैसे अचानक चिराग़ से जगमगा उठा। “अरे, सपना? मुमकिन है उसी में कोई सुराग़ छिपा हो!”

यूँ तो हर इंसान ख़्वाब देखता है—वे उतने ही अनगिनत होते हैं जितनी आकाश में बिजली की कौंध। कभी वे घटनाओं की कड़ी तोड़ देते हैं, कभी किरदारों का रंग-रूप बदल डालते हैं, कभी तहज़ीब के उसूलों को उलट-पलट देते हैं। कई बार वे बिन बुलाए मेहमान की तरह हमारी जागती दुनिया में घुस आते हैं—और पीछे एक अनकही कसक छोड़ जाते हैं। कहा भी जाता है कि कभी-कभी सपना ही सच की ओर इशारा कर देता है।

मगर इस सारी उलझन के बीच मयंक को उम्मीद की एक लौ जलती नज़र आई। उसने पहचान लिया कि ख़्वाब में वह ताक़त होती है जो टूटी हुई यादों को जोड़ सकती है, छिपे मायनों के दरवाज़े खोल सकती है, और ऐसी दुनिया की राह दिखा सकती है जहाँ तर्क की दाल नहीं गलती, मगर संभावनाओं का दरिया लबालब बहता है।

तर्क और हक़ीक़त की सरहद से बाहर कदम रखते हुए, मयंक अब उस रहस्यमय ख़्वाब की परतें एक-एक कर उधेड़ने को तैयार था।

और तब आरोहण ने अपना सपना यूँ सुनाना शुरू किया, जैसे कोई बूढ़ा क़िस्सागो चौपाल में धूप-छाँव तले बैठकर दास्तान छेड़ देता हो।

***       ***      ***      ***      ***

यह सोमवार, 14 अगस्त 1972 था। अगली सुबह तिरंगा फहरना था—पंद्रह अगस्त। पूरा मुल्क जश्न-ए-आज़ादी की रजत-जयंती की देहरी पर खड़ा था। वक्त का रथ, जिस पर हम सब सवार थे, एक और पड़ाव पार करने जा रहा था। हम—दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के गर्वित नागरिक—इतिहास के नए पन्ने के सामने खड़े थे। यह घड़ी थी आत्ममंथन की। आखिर सबसे बड़ा लोकतंत्र” का ख़िताब किसी विकासशील देश को यूँ ही नहीं मिला था! आलोचक भी मान चुके थे कि यह सच्चाई है। लिहाज़ा तैयारी थी एक शाही जश्न की—जो सुबह की पहली किरण के साथ शुरू होना था।

सरकारी दफ़्तरों, स्कूल-कॉलेजों और संस्थानों को अपनी-अपनी कामयाबियों का प्रदर्शन करना था। उस वक़्त मैं ग्यारह वर्ष का बच्चा था। जानता था कि स्वतंत्रता दिवस का क्या मतलब है। साल में बस एक दिन आता था जब हम प्रभात फेरी में निकलते—छोटे-छोटे गले से नारे लगाते, गाँव की कीचड़ भरी गलियों से गुजरते, लोगों को याद दिलाते कि आज़ादी का दिन लौट आया है। ये कोई फौजी परेड तो नहीं थी, मगर विजय का एक उत्सव ज़रूर था।

उस दौर का असल जज़्बा अहिंसा था—यानी हमें आज़ादी बग़ैर खून-खराबे मिली। पूरे माहौल में एक अजीब-सी पवित्रता थी—जैसे प्रार्थना-सभा हो, मगर देसी अंदाज़ में। प्रभात फेरी आधी आध्यात्मिक, आधी दुनियावी—और सत्तर के दशक के हिंदुस्तान की असल तस्वीर।

हम बच्चे गीली गलियों से गुज़रते, टखनों तक कीचड़ में भीगते हुए लोगों से मुट्ठी-भर चावल माँगते—मानो प्यार की भीख—इस आस में कि बदले में कोई मिठाई या टॉफ़ी थमा दे। मगर अक्सर मायूसी ही हाथ लगती। मास्टर साहब भेंट में मिले चावल खुद दबा लेते, और हमें बस नारों का शोर और प्रभात फेरी की हल्की-फुल्की मस्ती नसीब होती। आज प्राइमरी स्कूल के वे दिन बहुत पीछे छूट चुके हैं, लेकिन उन देशभक्ति से लबालब गीतों की धुनें अब भी कानों में गूँजती रहती हैं—

शांति, तरक़्क़ी, आज़ादी का तू ही वरदाता,

ए गांधी! सच का दीया, ख़ूबसूरती का दाता।”

वही ऐतिहासिक दिन फिर लौट रहा था—मगर इस बार कुछ ख़ास। रजत जयंती! वजहें भी कम न थीं—हमने जंग जीती थी, नक्शा बदला था, और नया मुल्क दुनिया के नक़्शे पर ला खड़ा किया था। सीमापार भाइयों को मुक्ति दिलाकर अपनी सियासी ताक़त शिखर तक पहुँचा दी थी। स्कूल वाले भी पीछे कहाँ रहने वाले थे! शिक्षकों ने तय किया कि जलसा एक दिन पहले से ही शुरू होगा।

इसी वजह से 14 अगस्त की शाम एक ख़ास दावत रखी गई। भेड़ के गोश्त का लज़ीज़ पकवान—क्योंकि हिंदुस्तानी गाँवों में बढ़िया खाना किसी भी आयोजन को उत्सव में बदल देता है। और यहाँ तो मौक़ा ही था जश्न-ए-आज़ादी का। मगर जब बच्चों को बुलाने की बारी आई, तो मास्टरों ने हद बाँध दी—सबको खिलाना नामुमकिन था। लेकिन मेरे लिए अलग फ़रमान था: मैं हेड बॉय था, इसलिए मास्टरों के साथ बैठना मेरा “विशेषाधिकार” ठहरा।

इस तरह 14 अगस्त का दिन मेरे लिए एक तरह का कर्टेन-रेज़र बन गया। मैं अकेला सौभाग्यशाली बच्चा था, जिसने मास्टरों का जश्न अपनी आँखों से देखा। कोई तो चाहिए था जो उनकी बातें सुने, उनकी हाँ में हाँ मिलाए, और छोटे-मोटे काम सँभाले—यही मेरा फ़र्ज़ था, शायद उससे भी बढ़कर।

कहाँ गया वो कसाई, वो धोखेबाज़?”—गरजे श्री देवकुमार, हमारे गणित के मास्टर। वे किसी ख़ास से नहीं बोले; बस हवा में उँगली लहराते हुए ग़ुस्से में बड़बड़ा रहे थे। मैं पास खड़ा उनकी सूरत पढ़ता रहा—वे मानो किसी अजीब मुसीबत में फँस गए हों।

वे हमारे स्कूल के उस दमनकारी शिक्षक-दल के सबसे क्रूर सदस्य थे, जो शिक्षा के नाम पर मारकुटाई में माहिर था। उन्हें ज्यामिति से ज़्यादा भरोसा अपनी निशानेबाज़ी पर था। पीछे बैठा बच्चा हो या आगे—लकड़ी का, धूल से भरा वह भारी डस्टर उनके लिए किसी हथियार से कम न था, और निशाना शायद ही कभी चूकता।

एक बार तो उन्होंने ग़ुस्से में डस्टर ऐसा उछाला कि बच्चे की माँग खुरच गई—बाल उखड़ गए और खोपड़ी पर लाल लकीर उभर आई। खून नहीं निकला, मगर बच्चे की आँखों से आँसू नदी बनकर बहने लगे। और उधर मास्टर जी देर तक आत्ममुग्ध मुस्कान में डूबे रहे—मानो किसी “कामयाब प्रयोग” पर इतराते हों।

सौभाग्य से, मास्टर देवकुमार का मिज़ाज लड़कियों के साथ कुछ और ही था। कभी-कभार उन पर तंज़ कसते, मगर उनकी ग़लती पर हाथ नहीं उठाते। सब लड़कों को मालूम था—यह खुला-खुला पक्षपात है। लेकिन गुरुजी के नाम पर जो ख़ामोश इज़्ज़त देने का रिवाज़ था, वही उनकी ढाल बन जाता। यही झुकाव—और लड़कियों को ज़्यादा नंबर देने की उनकी आदत—उन्हें छात्राओं के बीच मशहूर बना देती थी; एक ऐसी ख्याति, जिसे न कोई खुलकर पसंद कर पाता था, न खुलकर विरोध।

दोपहर ढल चुकी थी, मगर कसाई का कोई पैग़ाम नहीं पहुँचा।

अब इस जानवर का कत्ल करेगा कौन?”—मास्टर देवकुमार बुदबुदाए। उनके पीछे से बकरा मिमियाया—“मैं... हे... हे।” वह बरामदे के पास खूँटे से बँधा था।

वह एक छोटा-सा काला बकरा था, जिस्म पर सफ़ेद धब्बे। उसका आख़िरी सफ़र अब शुरू होने वाला था। इस राह में उसका साथी कसाई होगा—जो पेशेवराना अंदाज़ में, कम-से-कम तकलीफ़ के साथ, इस काम को अंजाम देगा। और भला इतनी रहमदिली से यह काम और कौन कर सकता था?

मास्टर साहब ने मेरी तरफ़ तीर जैसी नज़र डाली।

अरे, तू नीची जात का नहीं है क्या?”

दिमाग़ ने झट से मतलब पकड़ लिया—लंबा-दुबला हूँ, साथ ही नीची जात का; और यही मेरी क़ाबिलियत ठहरी। नतीजा साफ़ था: बकरे को हलाल करना मेरे जिम्मे आया।

जा, और इस बकरे को ख़त्म कर। ज़्यादा ड्रामा मत करना, समझा?”—कहकर उन्होंने रस्सी मेरे हाथ में थमा दी। आवाज़ में हुक्म का सख़्त, बर्फ़-सा ठंडा लहजा था।

ग्यारह साल का छोकरा अगर सफ़ाई से बकरा मार सकता है, तो मुझे क्यों डर लगे? मैंने मन-ही-मन तसल्ली दी। इंसान तो नहीं है, तो पाप भी कहाँ? और मास्टर साहब के पास खड़े रहने से तो बकरा ही बेहतर साथी लग रहा था। ऊपर से, यह तो बड़ा काम था—बड़ों वाला काम! मैंने खुद को बहलाया—दर्द देना, दर्द झेलने से आसान है।

मगर मारूँ तो कैसे? अब तक जो सबसे बड़ा जीव मारा था, वह पिछवाड़े तालाब की एक नन्ही मछली थी—वो भी कपड़े धोते-धोते, अनजाने में। मैं तो वैसे भी सख़्त सब्ज़ीख़ोर था। मेरे हाथ इस क़हर ढाने वाले काम के लिए बिलकुल अजनबी थे।

पहला ख्याल आया—गर्दन मरोड़ दूँ, जैसे गाजर की पत्तियाँ तोड़ते हैं। दूसरा ख्याल आया—सीधा सिर काट दूँ। किताब में पढ़ा था—बादशाह दुश्मन का सर काटकर फ़ख्र से नुमाइश करते थे। आँखों में राम-रावण का युद्ध घूम गया—कटे सिर बार-बार उगते जा रहे हों।

हाँ, सरकारी प्रचार विभाग की बदौलत वही पुरानी रामायण फ़िल्म देखी थी—चरागाह में घूमते प्रोजेक्टर पर। वही मेरी ज़िंदगी की पहली और आख़िरी फ़िल्म। वहीं से यह हुनर सीखा था—अब काम आ सकता है। तो सोचा, बकरे का सिर काटना रावण का सिर काटने जैसा ही है—या गाजर की पत्तियाँ तोड़ने जैसा।

शाम ढलने में अभी एक घंटा बाकी था। अगस्त की धूप अभी भी झुलसा रही थी। मैं गीली घास पर बकरे के पीछे-पीछे चलता रहा। जानवर मानो अपने घर की ओर लौटते कदम नाप रहा था।

भीतर से एक आवाज़ उठी—“ओ छोरे! अब तू जानवर-मारक बन गया! निपटा दे इसे। बकरे के चार पैर हैं, दो सींग हैं, और तू बस दो पैरों वाला—रावण वाला सपना छोड़।”

दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो उठी कि बकरे की तरफ़ अब रहम की नज़र डालना मुमकिन न रहा। वह मुझे पूरा शैतान लगने लगा—जैसे कोई सूमो पहलवान सीधी चुनौती दे रहा हो। मैंने छलाँग लगाई—“धप्प!”—और सीधा उसी पर जा गिरा।

मैं-हे-हे!”—बेचारा हक्का-बक्का रह गया। अब तक वह मुझे दोस्त समझ रहा था, घर तक ले जाने वाला साथी। और मैंने? मैंने तो धोखा दे दिया—बिलकुल कायरों जैसा काम!

उसकी कसैली, तीखी गंध ने मेरे भीतर के शिकारी को जगा दिया। मैं उसके ऊपर आ पड़ा, कोहनियाँ उसकी पसलियों में गड़ा दीं। एक हाथ से सींग, दूसरे से थूथन कस लिया। पूरा दम लगाकर उसकी गर्दन मरोड़ दी।

जानवर तिरछा भागा, मगर अब मिमियाने की आवाज़ नहीं निकल पा रही थी—शायद उसकी स्वर-रज्जुएँ टूट चुकी थीं। मैं पीछे ही पड़ा रहा। छह किलो का छोटा-सा बकरा भला मुझसे कैसे जीत पाता?

पर तभी...गड्ढा!

ओफ़्फ़ोह!

बिजली विभाग ने दस फुट का गड्ढा खोदकर यूँ ही खुला छोड़ दिया था—न घेराबंदी, न कोई तख़्ती। और देखते-ही-देखते हम दोनों उसमें जा गिरे—सरकारी लापरवाही का जीता-जागता नमूना।

अब खेल ख़त्म था। असली सवाल यही था—इस काले गड्ढे से बाहर कैसे निकला जाए?

दीवारें चिकनी थीं, काई से भरी हुई; ऊपर चढ़ना नामुमकिन। अँधेरा तेज़ी से गहराता जा रहा था। पलकें बोझिल होने लगीं, और दिल घर की आरामदेह बिस्तर के लिए तरसने लगा।

मेरी आख़िरी उम्मीद यही थी कि शिक्षक हमें ढूँढते हुए आ पहुँचेंगे। वे मुझे बकरे के साथ भागने नहीं देंगे—आख़िर वही तो उनके जुबली भोज का मुख्य पकवान था।

थोड़ी देर बाद ऊपर से कुछ आवाज़ें आईं। दिल धक् से रह गया—क्या यह कोई भूतिया सरगोशी थी? मैंने मन ही मन सोचा।

बादल हट चुके थे, तारे झिलमिला रहे थे। मैंने दबाकर एक जम्हाई ली। उधर बकरा हिल-डुलकर मुझे याद दिला रहा था कि काम अधूरा पड़ा है। अब जबकि वह लगभग स्थिर हो गया था, उसे आसानी से मारा जा सकता था। मगर अगले ही पल दिल काँप उठा—नहीं, अब ढर्रे से हटकर कुछ और सोचना होगा। बाहर निकलने का कोई रास्ता तलाशना ज़रूरी था। बकरा इंतज़ार कर सकता है—मैं उसे गड्ढे से बाहर निकलने के बाद निपटा लूँगा।

गिरते वक़्त मेरी कोहनी छिल गई थी और अब जलन होने लगी थी। शुक्र है कि मिट्टी नरम और चिकनी थी, वरना गिरावट कहीं ज़्यादा ख़तरनाक साबित होती। फिर भी इलाज ज़रूरी था। मैंने कोहनी सहलाना शुरू किया—वही घरेलू थेरैपी, जो देवकुमार जी हमें सिखाते थे: पहले उँगलियों से त्वचा को हल्के-हल्के सहलाना, मानो दर्द की नस टटोली जा रही हो… और फिर ठीक उसी जगह डंडा जमा देना—जैसे शेर शिकार पर झपटने से पहले उससे खिलवाड़ करता हो।

भूख तो थी ही, लेकिन प्यास उससे कहीं ज़्यादा तेज़ हो चली थी। क्या गड्ढे का पानी पी लिया जाए? ओह नहीं! उसमें सड़ाँध की बदबू थी—बकरा वहीं पेशाब कर चुका था।

किसी का पेशाब पी लेना—भले ही जान पर बन आए—मेरे लिए नामुमकिन था।

वो पल था जब बच्चे रो पड़ते, लेकिन हेड बॉय के लिए यह इजाज़त कहाँ!

बकरा अब धीमे-धीमे मिमिया रहा था, मगर उसकी आवाज़ की तीव्रता बढ़ती जा रही थी। तभी ऊपर से कदमों की आहट आई। गर्दन उठाई—कोई गड्ढे में झाँक रहा था! रीढ़ में उम्मीद की बिजली दौड़ गई—शायद राहत मिल ही जाए।

हेड बॉय, तुम नीचे हो?"—देवकुमार जी की बुलंद आवाज़ गूँजी।

मैंने सोचना शुरू किया कि अब कौन सी सज़ा मिलेगी। वो फिर से गरजे—इस बार और गुस्से में: “तुम हो नीचे, हेड बॉय?”

देवकुमार का ख़ास गुण था—गाली न भी दें, तो भी उनके शब्दों की धमक सामने वाले का कलेजा हिला देती थी।

अचानक टॉर्च की तेज़ रोशनी हम पर आ पड़ी।

काहे छुप रहे हो? आओ, अपना दिमाग़ मसाज करवाओ—चाँटे से!”—वे गरजे।

राहत-दल रस्सी, सीढ़ी और बांस लेकर नीचे उतरा। हैरत की बात यह थी कि उन्होंने सीधा-सीधा अंदाज़ा लगा लिया था कि हम बिजली विभाग के उसी गड्ढे में गिरे हैं। सच कहूँ, हमारे शिक्षक किसी सर्वज्ञानी संत से कम न निकले!

मैं गड्ढे से बाहर तो आ गया, मगर संकट कहाँ ख़त्म हुआ था! बकरा बिना किसी झिझक के ख़ुद चलकर कसाई के हवाले हो गया—मानो उसे अपनी तक़दीर मालूम हो और वह किसी बेमतलब जश्न का हिस्सा बनने से इनकार कर रहा हो।

पीछे-पीछे आओ,”—देवकुमार ने रहस्यमय लहजे में कहा। मैं चुपचाप उनके पीछे हो लिया। थोड़ी ही दूर जाकर कसाई झाड़ियों की ओर मुड़ गया। ‘मैं… हे… हे’—बकरे ने आख़िरी बार मिमियाया। और फिर जो ख़ामोशी उतरी, वह विदाई की एक गूँज-सी लगी—मेरे उस गुप्त साथी की, जो अब दर्द से आज़ाद हो चुका था। उसका छह किलो का जिस्म अब किसी तकलीफ़ का बोझ नहीं ढोएगा।

और मैं? भीतर एक कंपकंपी दौड़ गई। अब क्या होगा—छड़ी की सिसकारी? पीठ और नितंबों पर उसकी जलती हुई चुभन? जाति, जन्म और ज़िंदगी की नई-नई तफ़सीर?

सुन रहे हो, हेड बॉय!”—देवकुमार गरजे।

हे मेरे बाप! क्या अनुशासन की भी कोई हद होती है? मैं मन ही मन सोच रहा था। मगर देवकुमार जी के सामने तो सब कुछ मुमकिन था।

उनके बाएँ हाथ में एक थाली थी—जिसमें कच्चा गोश्त पड़ा था, सफ़ेद चर्बी की पतली तहों में लिपटा हुआ। वही नन्हा बकरा अब रक्तहीन देह बनकर थाली में रखा था।

खा लो, हेड बॉय,”—देवकुमार के होंठों पर एक सख़्त मुस्कान तनी। “ये तुम्हारे आज के तमाशे का इनाम है। चबाओ इसे।”

मेरी झिझक ने उन्हें छड़ी उठाने पर मजबूर कर दिया। शुरुआती वार तेज़ और झनझनाते हुए पड़े—मानो खाना खिलाने से पहले बस एक औपचारिकता निभाई जा रही हो। फिर वे पास आए और छड़ी को कांख में दबा लिया। अब उनका दाहिना हाथ आज़ाद था—मेरी पीठ पर ऐसे फिरा, जैसे कोई चित्रकार कूची से तस्वीर पर आख़िरी स्ट्रोक दे रहा हो। उनके होंठों पर एक नियंत्रित, मगर निर्दयी मुस्कान फैल गई।

फिर उन्होंने छड़ी निकाली और दोबारा बरसाई।

खा लो, हेड बॉय—खा लो अपना हिस्सा।” कहते हुए वे थाली मेरी नाक तक ले आए। छड़ी की सिसकारी और चेहरे की तनी हुई मांसपेशियाँ—ग़ुस्सा और सुरूर का यह घालमेल किसी ज़हरीले नशे-सा था।

आख़िरकार, मैंने बिना चबाए ही कच्चे गोश्त का एक टुकड़ा निगल लिया।

वाह! असंभव कुछ नहीं होता। देवकुमार झूम उठे—मेरी नहीं, अपनी फ़तह पर। “शाबाश, हेड बॉय! शाबाश!” वे गा-गाकर झूमने लगे।

उधर अस्थायी रसोई से मटन करी की महक उठ रही थी। स्कूल की झोपड़ी की छत से झाँकती बाँस की लकड़ियाँ चाँदनी में किसी खाली पेट भिखारी की पसलियों जैसी लग रही थीं। और कल... हमारी आज़ादी की सिल्वर जुबली थी।

***      ***      ***      ***      ***

अरे वाह! क्या क़िस्सा था!”

बात पूरी करके आरोहण चुप हो गया। वह पद्मासन में बैठा रहा—आँखें बंद, पीठ सीधी—मानो गहरे ध्यान में डूब गया हो। मयंक को डर था कि कहीं वह फिर उसी बीमार-सी ख़ामोशी में न लौट जाए, मगर उसने टोकना मुनासिब न समझा।

अब सवाल यह था—आख़िर इस ख़्वाब से मयंक को क्या हासिल हुआ? वह जानना चाहता था कि उस हिल स्टेशन में आरोहण कैसे और क्यों आ पहुँचा, मगर इस स्वप्न में कोई सीधा सुराग नहीं था। आरोहण कह रहा था कि 1972 में वह हाई स्कूल में था, जबकि हक़ीक़त यह थी कि उसी साल उसका जन्म हुआ था! उसने ख़ुद को नीच ज़ात का बताया—जबकि असल में वह तो एक कप्तान का बेटा था।

सच्चाई यह थी कि उसका ताल्लुक़ उस ख़ानदान से था, जिसके बुज़ुर्ग उड़ीसा में ज़मींदार रहे थे। कोई अस्सी बरस पहले उस घराने की एक शाखा विशाखापटनम आ बसी थी, और आते ही ज़मीनें ख़रीदने लगी। ज़मीन से उन्हें ऐसा मोह था कि छोटे-छोटे पहाड़ तक ख़रीद डाले थे!

लोगों में मशहूर था कि उनकी ज़मीन से कभी कोई गुप्त ख़ज़ाना निकला होगा। उनकी दौलत की नुमाइश यूरोपीय मेहमानों को चंदन की लकड़ी पर उबली चाय परोसकर की जाती थी। पुश्तैनी हवेली के दरवाज़े चंदन के, देवी-देवताओं की अष्टधातु की मूर्तियाँ, पालकी—ख़ालिस सोने की। यहाँ तक कि दांत कुरेदने की तीली तक सोने की होती थी!

ख़्वाब ग़रीब को बादशाह बना सकते हैं, मगर यहाँ तो बादशाह ख़्वाब में फ़क़ीर बन गया! अजीबो-ग़रीब खेल!

मयंक के दिल में ख्याल आया—शायद आरोहण की दास्तानें उसी दुनिया से आती हैं जहाँ तक पहुँचना आँख खोलकर नहीं, आँख मूँदकर ही मुमकिन है। लोककथाओं में माना जाता है कि श्रेष्ठ भविष्यवक्ता अक्सर अंधे होते हैं—क्योंकि वे दृश्य से नहीं, अंतरदृष्टि से देखते हैं। जब आँखें इस जगत से बंद होती हैं, तभी भीतर की आँख खुलती है—जो सत्यों, संवेदनाओं और ऊर्जा को देख पाती है। वे रूप और माया से प्रभावित नहीं होते, इसलिए उनके कथन ज़्यादा विश्वसनीय माने जाते हैं।

यहाँ अंधापन कमजोरी नहीं, बलिदान है—उस कीमत की अदायगी, जिसके बदले उन्हें सूक्ष्म दृष्टि मिलती है। ऐसे अंधे ख़्वाबदर्श लोग ज़िंदगी की सरहद पर खड़े रहते हैं—इस लोक और परलोक, जाग और स्वप्न, यथार्थ और तसव्वुर के बीच। शायद इसी वजह से आरोहण को भी किसी अनकही कहानी का गुप्त ख़ज़ाना तभी मिलता है—जब वह आँखें मूँदकर इस जहाँ से बेगाना हो जाता है।

मयंक ने सोचा—अगर इस विचार को आरोहण पर लागू करें, तो नज़र की तुलना याददाश्त से की जा सकती है। जैसे दृष्टिहीन इंसान अंतर्दृष्टि तक पहुँचता है, वैसे ही विस्मृति में डूबा शख़्स भी तजुर्बों की एक नई ज़मीन पर क़दम रख सकता है। याददाश्त बीते लम्हों की पुनरावृत्ति है, मगर याददाश्त की अनुपस्थिति—कल्पना, एहसास और सांस्कृतिक शऊर के लिए एक कोरा कैनवस।

शुक्र है, आरोहण फिर चिड़चिड़ा नहीं हुआ। जब विदा लेने का समय आया, मयंक ने पूछा—“कल सुबह थोड़ी टहलें, आरोहण? अगर तुम्हें अच्छा लगे तो?” मानो दोनों ही इस रात की भारी बातों से कुछ राहत चाहते थे।

ठीक है,” आरोहण ने मुस्कराकर कहा, “मुझे कोई ऐतराज़ नहीं।”

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By

अनन्त नारायण नन्द 

भुवनेश्वर, दिनांक 01-01-2026

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