The Unadorned

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Sunday, February 01, 2026

कौन था वह?

 


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The post constitutes the Hindi version of a chapter in my novel, "Ivory Imprint". Very soon - maybe in a month's time - I'll finish translating the novel from its original English version into Hindi and that will appear under the title "चेतना की खोज". I have also posted the original version of this chapter in this blog, just a moment ago, and its title is "To Exorcise or NotHope my readers will like my efforts and encourage me.

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कौन था वह?

मयंक गहरी नींद में था, जब अचानक उसे एहसास हुआ कि कुछ उसकी छाती पर भारी पड़ रहा है और उसकी टाँगें मानो लकड़ियों के ढेर तले दब गई हों। उसने आँखें खोलीं तो देखा कि आरोहण अपनी जगह छोड़कर उसकी ओर लुढ़क आया है और अपने पाँव उसके ऊपर जमा दिए हैं। इसी वजह से वह खुद को पूरी तरह जकड़ा हुआ महसूस कर रहा था।

इसके अलावा, आरोहण की मुट्ठियाँ कसकर भींची हुई थीं; सिर एक ओर से दूसरी ओर डोल रहा था। वह तेज़-तेज़ साँसें भर रहा था और कुछ कहने की जद्दोजहद कर रहा था, जबकि उसकी आँखों की पुतलियाँ अजीब ढंग से घूम रही थीं। तभी अचानक उसने आँखें खोल दीं।

क्या हो गया तुझे, आरोहण? तुझे तो जैसे दौरा-सा पड़ रहा था। सपना देखा क्या?” मयंक ने हैरानी से पूछा।

सपना… हाँ, देखा तो था,” आरोहण ने उनींदे लहजे में कहा, “लेकिन ये दौरे-वौरे की बातें क्यों, भाई? मैं तो बस सोच रहा था कि मेरे लैपडॉग आइबो के उस हमशक्ल का क्या करूँ।”

मयंक हल्के से मुस्कराया। उसे मालूम था कि लोग नींद में बहुत कुछ कर बैठते हैं—कभी बकबक करना, कभी उठकर चलना, कभी कॉफ़ी बना लेना, और तो और दोस्तों की लॉकर से चुपके-चुपके बिस्कुट चुरा लेना—ये सब ग़फ़लत में हो जाता है।

आरोहण अब पूरी तरह उत्साहित था। "सुन ले मेरा ख़्वाब, भाई, नहीं तो भूल जाऊँगा," उसने इसरार करते हुए कहा।

मयंक, जो अब क़ैदी श्रोता बन चुका था, बोला, "मैं कान लगाकर सुन रहा हूँ, आरोहण, बोलते जाओ।"

हालाँकि वक़्त तो दोबारा नींद में लौट जाने का था, लेकिन मयंक अब भी यही आस लगाए था कि आरोहण का यह ताज़ा ख़्वाब शायद उसके अतीत पर कुछ रौशनी डाल दे। दरअसल, इतने सपने सुन लेने के बावजूद, जिनमें से ज़्यादातर का कोई सिर-पैर नहीं निकलता था, मयंक मन ही मन यही चाहता था कि यह सिलसिला तब तक चलता रहे—जब तक आरोहण के पास सपनों का ज़ख़ीरा बाक़ी है, या कम से कम तब तक, जब तक उसे अपने दोस्त की ग्यारह बरस की ग़ैरहाज़िरी का कोई ठोस सुराग न मिल जाए।

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आधी रात को किसी सुनसान जंगल से गुज़रना सचमुच दिल दहला देने वाला तजुर्बा होता है। सूखे बाँसों की आपसी रगड़ से उठती किरकिराती आवाज़ किसी चुड़ैल की चीख़ जैसी डरावनी लगती है। राह के किनारे उगी कोई मामूली झाड़ी भी ऐसे मालूम पड़ती है, मानो कोई बदनुमा साया एड़ियों के बल घात लगाए दुबका हो। पत्तों की सरसराहट से दिल में यह वहम जगता है कि कोई दबे पाँव पीछे-पीछे आ रहा है। झींगुरों की कराह, मेंढकों की टर्राहट, दरिंदों की दहाड़ और उल्लुओं की हूटिंग—ये सब मिलकर किसी भी शख़्स के होश उड़ा देने के लिए काफी हैं, जो उनकी भुतही दुनिया में क़दम रखने की जुर्रत कर बैठे। ऐसे माहौल में, एक छोटे बच्चे या किसी पालतू कुत्ते की सोहबत भी जंगल पार करने का सहारा लगती है। आधी रात का जंगल वाक़ई इतना खौफ़नाक हो सकता है!

मैं अभी-अभी अपनी जंगली मुहिम से लौटा हूँ। आह, सोचता हूँ तो लगता है—क्या अजीबो-ग़रीब रात थी!

मैं फ़ुलबाणी की ओर जा रहा था, जो कंधमाल ज़िले का सदर-मकान है। रास्ते में कलिंगा के एक सरकारी विश्रामगृह में ठहरने का फ़ैसला किया। वह जगह "कउरी जिरा" नाम के एक घने वर्षावन के क़रीब थी।

कउरी जिरा की शान-ओ-शौकत के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था—साँस रोक देने वाली, दिल मोह लेने वाली, मानो सारी जादूगरी वहीं आकर समा गई हो। वहाँ की भोर की ख़ामोशी वसंत की महकती ख़ुशबू में घुलकर दिल को मदहोश कर देती है। झाड़ियाँ अपारगम्य नहीं थीं; उनकी सलीक़ेदार बनावट चितकबरे आसमान-सी लगती थी—न कि किसी समंदर किनारे बिखरे कूड़े-कचरे की तरह बेतरतीब। जंगल में साल के पेड़ हर तरफ़ सलीके से खड़े नज़र आते थे, और उनके तनों के चारों ओर फैली साफ़-सुथरी ज़मीन पहली ही नज़र में दिल लुभा लेती थी। वे पेड़ सचमुच जंगल के बादशाह मालूम होते थे—उनकी ऊँची छतरियाँ जितनी दिलकश थीं, ज़मीन भी उतनी ही करीने से सजी हुई थी।

वैज्ञानिक सोच और आदिवासी विकास”—यही मेरे शोध का विषय था। योजना थी कि निष्कर्षों को किस्तों में प्रकाशित करूँ और उसके साथ-साथ एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाऊँ। इलाक़े के कुछ समाजसेवियों से बातचीत का इरादा भी था, जो अंधविश्वास और डायन-प्रथा के ख़िलाफ़ लगातार जद्दोजहद कर रहे थे।

अप्रैल की एक सुकून-भरी शाम थी, जब मैं उस सरकारी विश्रामगृह पहुँचा। उफ़! पिछले बारह घंटे से बिजली ग़ायब थी। केयरटेकर ने बताया कि अगले अड़तालीस घंटे तक आने की कोई उम्मीद नहीं। मजबूरन, मैंने उस रात की असुविधा सह लेने का मन बना लिया।

मगर अजीब बात यह थी कि मेरा पालतू आइबो—लाल रंग का निडर पोमेरेनियन—ज़रा भी परेशान न था। वह अपने मालिक की क़ाबिलियत जानता था, और शायद इसी वजह से बेफ़िक्र भी था। बल्कि वह तो खेलने के मूड में दिख रहा था। उसके अंदाज़ से लगता था मानो कह रहा हो, “ये छोटी-मोटी तकलीफ़ें तो आती-जाती रहती हैं; मैं तो अब किसी साहसिक मुहिम की तैयारी में हूँ!”

उस जगह की मिट्टी की भीनी ख़ुशबू और सुकून भरा माहौल मुझे भी छोटी-छोटी फ़िक्रों से आज़ाद कर गया। जैसे मेरा फुर्तीला पालतू हर नए मोड़ पर उत्साह से उछल पड़ता है, वैसे ही मैंने भी उम्मीद की डोर थाम ली। कउरी जिरा की झाड़ियों के बीच शायद मेरी तहक़ीक़ात को नई दिशा मिल जाए—कहीं कोई भूली-बिसरी डायन की गुफ़ा या उसका जादुई असबाब हाथ लग जाए! एक स्थानीय बाशिंदा, जो उस ज़मीन से भली-भांति वाक़िफ़ था, सहर्ष गाइड बनने को राज़ी हो गया। उसका कहना था कि लोग उसके तजुर्बे से फ़ायदा उठाएँ। कुल मिलाकर, यह सफ़र यादगार बनने ही वाला था।

कउरी जिरा” नाम में एक अजीब-सी तुकबंदी थी। मैंने पूछा—क्या इस नाम का कोई मतलब है? गाइड, जो जानकारी देने को काफ़ी उतावला था, बोला, “मायने हैं, हुज़ूर—वो जंगल जहाँ पुराने ज़माने में भैंसे ग़ायब हो जाया करते थे!” यह तफ़सीर बड़ी दिलकश और प्यारी लगी—किसी ‘शैतान की गुफ़ा’ या ‘वीरान बीहड़’ जैसी डरावनी नहीं।

हमने तय किया कि अगली सुबह निकलेंगे। हमारी छोटी-सी टोली थी—मैं, गाइड और आइबो। आइबो—वो निडर मुसाफ़िर—जोश से लबरेज़ था; गाइड, तजुर्बेकार होते हुए भी, भूत-प्रेत और उनकी नस्लों की कहानियों में डूबा रहता था। मुझे डर था कि कहीं यह सफ़र मिडनाइट्स चिल्ड्रेन” की तरह न हो जाए, जहाँ सलीम और उसके दोस्त सुंदरबन में भटक जाते हैं। मगर गाइड का दावा था कि वो सिर्फ़ हवा की ख़ुशबू सूंघकर रास्ता पहचान लेता है! आइबो ग़ौर से हमारी बातचीत सुन रहा था—उसकी हिलती पूँछ उसकी रज़ामंदी का सबूत थी। इतना खुश नज़र आ रहा था कि मानो अभी मुँह खोलकर कह दे: सुनिए मालिक, मैं तो बेहद रोमांचित हूँ! अगर आप किसी वजह से नहीं गए, तो मैं अकेले ही निकल पड़ूँगा।” इत्मिनान से वो आराम करने चला गया।

शाम की नाश्ता और एक सिगरेट के बाद, मैं गाइड से थोड़ी देर और गुफ़्तगू करता रहा। दिलचस्पी ऐसी थी कि बार-बार वही सवाल दोहरा देता:

क्या रास्ते में कोई रीछ हमें घात लगाकर दबोच सकता है?”

नहीं, हरगिज़ नहीं!” गाइड ने तसल्ली दी। “भालू रात तक अपनी मांद से बाहर नहीं निकलते।” फिर भी, एहतियातन हमने तय किया कि सुबह थोड़ा देर से निकलेंगे और दोपहर के खाने से पहले ही लौट आएँगे।

अब रात के सवा दस बज चुके थे और मेरी गाइड से गुफ़्तगू मुकम्मल हो चुकी थी। मैं फौरन उस छोटे कमरे की ओर दौड़ा, जहाँ आइबो ठहरा हुआ था और अपनी रोज़ाना की रात की सैर के लिए बेसब्री से मेरा इंतज़ार कर रहा था। यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। आम तौर पर अगर उसकी दिनचर्या में बिना रज़ामंदी के कोई तब्दीली हो जाती, तो वह बेचैनी में कूँ-कूँ करने लगता।

लेकिन आज अजीब सन्नाटा था—हालाँकि हम काफ़ी देर कर चुके थे। मगर आइबो था कहाँ? यह कोई वक़्त नहीं था कि वह अपने-आप बाहर निकल जाए। वह कोई आवारा नस्ल का थोड़े ही था!

"आइबो, ओ मेरे मनमौजी, मेरे शहज़ादे आइबो!" मैं पागलों की तरह बग़ीचे के पिछवाड़े में उसे ढूँढने लगा। जवाब सन्नाटे का मिला। मैंने बग़ीचे के हर कोने को छान डाला—यहाँ तक कि उन छोटी-छोटी झाड़ियों में भी, जहाँ आइबो खेलना पसंद करता था। लेकिन सब बेकार।

भटकना आइबो के मिज़ाज में कभी शामिल नहीं था। हाँ, उसने जीनिया की क्यारी को इस कदर खोद डाला था कि अंकुर फूटने की गुंजाइश ही नहीं बची, अब तक मज़े से आधा दर्जन तकिए फाड़ डाले, आँगन के हर चमेली के पौधे पर लघुशंका कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, और शैंकी नाम की बिल्ली से बेवजह झगड़ा मोल लिया। लेकिन अपने मालिक की हद पार कर बाहर आवारागर्दी करना—ये उसकी आन-बान-शान के ख़िलाफ़ था। तो फिर गया कहाँ? और वह भी इस अजनबी जगह में?

मेरी बेताब पुकार सुनकर केयरटेकर दौड़ा आया, मगर कोई कारगर जानकारी न दे सका।

"हुज़ूर, यहाँ विश्रामगृह में कोई नहीं है जो आपके कुत्ते को चुरा ले!" उसने मेरे अनकहे इल्ज़ाम का जवाब देते हुए कहा।

अब चाहे आइबो नासमझी में कहीं निकल गया हो या किसी चोर की नज़र का शिकार हो गया हो, हमें तो बिना सिरा पाए तलाश शुरू करनी थी। मंज़िल: कउरी जिरा। ग़नीमत थी कि गाइड अब तक गया नहीं था, सो हमने फ़ौरन रात्रिकालीन तलाश का इरादा कर लिया।

मैं टॉर्च साथ लाना नहीं भूला, जबकि गाइड ने लोहे से मढ़ी हुई लाठी उठाई—यानि उसके निचले सिरे पर लोहे की चप्पी चढ़ी थी, ताकि ज़मीन पर टिकाऊ रहे और जल्दी न घिसे। ऊपर से, उसका यक़ीन था कि लोहे को छू लेने से भूत-प्रेत और उनके तमाम कुनबे से बचाव हो जाता है। उसके पास नमक की एक छोटी पोटली भी थी—कहता था, यह सबसे सख़्त रूहों को भी डराने के लिए काफ़ी है।

हमने जल्द ही तक़रीबन एक किलोमीटर का फ़ासला तय कर लिया। रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था और बड़े-बड़े पत्थरों से अटा पड़ा था। मैंने आइबो को पुकारा, मगर कोई जवाब न आया—सिर्फ़ मेरी आवाज़ थी, जो जंगल की ख़ामोशी में गूँजकर लौट रही थी। मेरी टॉर्च की रोशनी गहरे अंधेरे के सामने पस्त पड़ती जा रही थी, और मुझे ऐसा लगने लगा मानो मैं किसी कोयले की खान में भटक रहा हूँ, जहाँ मेरी एकमात्र रोशनी किसी भी पल बुझ सकती है।

हम बीस मिनट और बढ़े और एक ऐसे मोड़ पर पहुँचे, जहाँ रास्ता दो हिस्सों में बँट गया। आइबो किसी भी राह पर निकल गया होगा, मगर उसका कोई सुराग नहीं था। आख़िरकार हमने अलग-अलग दिशाओं में तलाश का फ़ैसला किया—गाइड बाएँ मुड़ा और मैं दाएँ।

पाँच मिनट भी नहीं गुज़रे थे कि गाइड के क़दमों की आहट जंगल में कहीं गुम हो गई। अब मैं बिल्कुल अकेला था। आइबो को पुकारता रहा, मगर डर भीतर ही भीतर पहाड़ की तरह बढ़ता चला गया। न मेरे पास गाइड की लोहे से मढ़ी लाठी थी, न भूत-भगाने वाला नमक। अब तो मेरी अपनी आवाज़ ही मुझे खौफ़नाक लगने लगी थी—उसकी गूँज मेरी रीढ़ में कभी तपिश, कभी ठंडी लहर दौड़ा देती। नतीजा यह हुआ कि मेरे क़दमों की रफ़्तार भी डगमगाने लगी।

अचानक मेरी दाहिनी ओर कुछ सरसराता हुआ गुज़रा—सूखी पत्तियों की मोटी परत को चीरता हुआ। मेरी टॉर्च की रोशनी इतनी कमज़ोर थी कि मैं साफ़-साफ़ देख न पाया।
शायद कोई लोमड़ी या खरगोश होगा,” मैंने अपनी दहशत दबाने की कोशिश की और आगे बढ़ गया।

थोड़ी ही देर में कुछ सौ क़दम दूर किसी जानवर के खर्राटे सुनाई दिए। मैं ठिठक गया। टॉर्च की रोशनी चारों तरफ़ घुमाई, मगर नतीजा सिफ़र ही रहा। किसी भालू के अचानक सामने आ जाने का ख़याल आते ही मैं काँप उठा। आँखें बंद कर हिम्मत बटोरने की कोशिश करने लगा।

पास ही एक पानी का गड्ढा था, जिसमें न कोई धारा मिलती थी, न कोई निकलती थी। मैंने उधर नज़र डाली—कुछ दिखाई न दिया। मगर दूसरी बार देखा तो टॉर्च की रोशनी अचानक तेज़ हो उठी।

और वहाँ क्या था?

अरे! वहाँ आइबो था—एक चट्टान पर बैठा, खुद में सिमटा हुआ। बेचारा बेहद परेशान मालूम पड़ रहा था; पेट खाली, जान पूरी तरह थक चुकी थी। क्लांति और निढालपन उसके जिस्म से टपक रहा था। शुद्ध नस्ल के कुत्ते अक्सर ऐसे ही होते हैं—मैंने खुद को तसल्ली दी—अपने अज़ीज़ों से जुदाई वो सह नहीं पाते। उसने मुझे ऐसे देखा, मानो हमारे पुराने रिश्ते की डोर याद करने की कोशिश कर रहा हो।

मैंने उसे नर्मी से गोद में उठाया और वापसी की राह पकड़ ली। उसका जिस्म ठंडा था, लेकिन उसने अपना सिर मेरी बाँह के नीचे छुपा लिया। इससे मुझे हल्की-सी गुदगुदी भी हुई और क़दमों की लय भी लौट आई। अंधेरे, वीरान जंगल का खौफ़ जैसे धीरे-धीरे पिघलने लगा।

अब मुझे अपने गाइड को इत्तला देनी थी। जहाँ हम जुदा हुए थे, वहाँ पहुँचने में तक़रीबन आधा घंटा लग गया, लेकिन गाइड अब तक लौटा न था।

"आइबो यहाँ है!"—मेरी तरफ़ से ज़ोरदार पुकार थी, मगर कोई जवाब न आया। आधी रात बीत चुकी थी, और जंगल हर पल और ज़्यादा सीलन भरा, बेचैन करने वाला लगता जा रहा था। आइबो भी बेक़रार हो उठा।

वो मेरी गोद से कूद पड़ा और बिना पीछे देखे चल पड़ा। हैरत होती है कि एक पालतू जानवर भी इतना गृहातुर हो सकता है!

मैं भी उसके पीछे-पीछे विश्रामगृह पहुँचा। वह सीधे कमरे के कोने में बने अपने छोटे-से बिस्तर की तरफ़ बढ़ा। अरे बाप रे! वहाँ आइबो पहले से मौजूद था—अपने ही बिस्तर पर इत्मिनान से सोता हुआ। तो फिर जिसे मैं पानी के गड्ढे से उठा लाया था, वह कौन था? क्या वह मेरा वही “गुडी-मूडी आइबो” नहीं था? मेरी हैरानी की कोई हद न रही।

मैंने दोनों जीवों को बारी-बारी से देखा। दोनों हूबहू एक जैसे थे—एक ही क़द-काठी, वही रंग-रूप, वही बालों की घनता और वही चमकती नाक। उनमें फर्क करना नामुमकिन था। अंजाना डर फिर से पूरे ज़ोर-ओ-शोर के साथ लौट आया। मैं सिर से पाँव तक काँप उठा; जिस्म का हर रोम खड़ा हो गया। चीख़ना नामुमकिन था—गला सूख चुका था। बस एक धीमी, लगभग अनसुनी सिसकी ही निकल पाई।

कउरी जिरा से आया आइबो मेरी तरफ़ झुंझलाकर घूरने लगा। उसकी आँखों में शुद्ध शैतानियत चमक रही थी। फिर उसने नज़र फेर ली और पुराने आइबो की तरफ़ देखा। धीरे-धीरे वह उसकी ओर बढ़ा—पूरी तरह इत्मीनान के साथ, बिना डरे, बिना पीछे हटे। एक कुत्ता दूसरे कुत्ते के इतने क़रीब पहुँचे—वह भी बिना झगड़े के—यह अपने आप में ग़ज़ब का मंज़र था। शायद कुत्तों की दुनिया में कोई नई तहज़ीब चल पड़ी हो!

अचानक उसने अपने चारों तरफ़ बेइंतहा तेज़ी से घूमना शुरू किया। फिर वह हवा में उठा और असली आइबो में जा समाया—मानो किसी धूम्रपान करने वाले के सिर के ऊपर धुएँ का गोल छल्ला बन गया हो। जैसे कोई छोटा बुलबुला बड़े बुलबुले में समाकर अपनी पहचान पूरी तरह ग़ायब कर दे। कुछ ही पलों में आइबो गहरी नींद में डूब गया—जैसे कुछ हुआ ही न हो।

इतने में केयरटेकर हड़बड़ाकर दौड़ा आया। "माफ़ कीजिए हुज़ूर, आपको बेवजह बाहर जाना पड़ा। आइबो तो यहीं था। आपके निकलने के थोड़ी ही देर बाद अपने बिस्तर पर सोता मिला।"

उसी वक़्त गाइड भी आ पहुँचा। मुझे देखकर वह खुश हुआ और आइबो को उसके बिस्तर पर देखकर और भी आश्वस्त

"सर, कहाँ मिला वो?" गाइड ने ताज्जुब से पूछा।

मैं दोहरे आइबो की अजीबो-ग़रीब दास्तान सुनाने ही वाला था कि केयरटेकर बीच में बोल पड़ा, "अरे चाचा, आइबो तो यहीं था। आप लोगों के जाते ही थोड़ी देर बाद अपने बिस्तर पर पड़ा मिल गया।"

इस तरह, मैं न तो किसी को ये क़िस्सा सुना सका, न ही इस वाक़ए का कोई माक़ूल जवाब ढूँढ पाया। अगर मुँह खोलता, तो लोग मुझे टोने-टोटके में फँसा कोई बेवक़ूफ़ समझते। और हाँ, मुझे दोगला तर्कवादी भी कहते—वो पाखंडी जो हर वक़्त वैज्ञानिक सोच का राग अलापता फिरता है।

अब मुझे किसी से तसल्ली चाहिए थी। कौन कह सकता है कि वो कुत्ता कोई भूत-प्रेत या वेयरवुल्फ, यानी भड़मानस, का रूप न हो? मगर असली सवाल तो यही था—क्या अब मुझे किसी ओझा को बुलाना चाहिए?

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यही सब मेरे ख़्वाब का हिस्सा था, और फिर अचानक नींद टूट गई।”—आरोहण ने फ़िल्मी ठाठ से कहा।

मयंक को यह क़िस्सा बेहद दिलचस्प लगा, मगर फिर वही पुराना सवाल सामने आ खड़ा हुआ: आख़िर वह अपने दोस्त के ख़्वाब और हक़ीक़त के बीच तालमेल कैसे बिठाए? एक कुत्ते का दूसरे में समा जाना जितना मज़ाक़िया लगता था, उतना ही गहरी अहमियत भी रखता था। क्या यह इशारा था कि अब आरोहण को वह क़ाबिलियत मिल चुकी है—अपने यार के दिल-ओ-दिमाग़ में झाँकने की, और किसी नाज़ुक रूहानी सतह पर ख़ुद को वहाँ पहुँचा देने की?

सुबह के छह बज चुके थे, और आरोहण फिर से गहरी नींद में डूब चुका था। मयंक उसकी साँसों की उतार-चढ़ाव भरी लय महसूस कर रहा था। पिछली शाम होटल के एक मुलाज़िम ने उसे बताया था कि सड़क के पार रेसकोर्स नाम का एक बेहतरीन वॉकर ट्रैक है, जहाँ सुबह-सुबह सैकड़ों सेहत-प्रेमी जमा होते हैं। मयंक की उड़ान 11 बजे थी, इसलिए उसने सोचा कि क्यों न एक छोटी-सी सैर के लिए वक़्त निकाला जाए।

ढाई किलोमीटर लंबे, हरे-भरे गोल ट्रैक पर टहलते हुए मयंक ने जेब से वह काग़ज़ी रोल निकाला, जो उसे वालपारई में आरोहण के कमरे से मिला था। सावधानी से खोलते ही उसमें से एक रेलवे टिकट निकला—नीलगिरि माउंटेन रेलवे का—जिसमें 26 जनवरी 2012 को ऊटी से मेट्टुपालयम की यात्रा दर्ज थी।

मयंक का क़दम ठिठक गया। इसका मतलब था कि उस दिन आरोहण दिमाग़ी तौर पर बिल्कुल सही-सलामत था… या फिर किसी और ने उसके लिए यह टिकट ख़रीदा था। मगर क्यों? किसने? और किस मंसूबे से?

एक पल के लिए उसके ज़हन में ख़याल कौंधा—शायद किसी देशभक्त हिन्दुस्तानी ने मदद की नीयत से, गणतंत्र दिवस पर, उसके लिए यह टिकट ले दिया हो। मगर यह संभावना उतनी ही जल्दी धुंधली हो गई, जितनी तेज़ी से आई थी। मयंक को याद ही नहीं आ रहा था कि क्या आरोहण कभी नीलगिरि की वादियों में गया भी था। और अगर गया भी, तो पहुँचा कैसे—जबकि सब जानते थे कि उस वक़्त वह दिमाग़ी तौर पर अस्थिर था।

तिरुपति यात्रा के दौरान वह अपने दो चाचाओं और चाची के समूह से बिछुड़ गया था। तो फिर कौन था जिसने उसे ऊटी तक पहुँचाया? और किसने नीलगिरि माउंटेन रेल की उस ठंडी, धुंध में डूबी सुबह उसकी यात्रा मुकम्मल कराई?

अब मयंक के दिल में यह एहसास गहराई से जम चुका था—जो सुराग अभी-अभी हाथ आया है, वह इस रहस्य का दरवाज़ा खोल सकता है… या फिर किसी और बड़े, अनदेखे भँवर में उसे खींच सकता है।

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By

अनन्त नारायण नन्द 

भूबनेश्वर 

दिनांक - 1-2-2026

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