The Unadorned

My literary blog to keep track of my creative mood swings with poems n short stories, book reviews n humorous prose, travelogues n photography, reflections n translations, both in English n Hindi.

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I'm a peace-loving married Indian male on the right side of '50 with college-going children, and presently employed under government. Educationally I've a master's degree in History, and another in Computer Application. Besides, I've a post graduate diploma in Management. My published works are:- (1)"In Harness", ISBN 81-8157-183-5, a poetry collections and (2) "The Remix of Orchid", ISBN 978-81-7525-729-0, a short story collections with a foreword by Mr. Ruskin Bond, (3) "Virasat", ISBN 978-81-7525-982-9, again a short story collection but in Hindi, (4) "Ek Saal Baad," ISBN 978-81-906496-8-1, my second Story Collection in Hindi.

Saturday, June 20, 2015

God is Fast Asleep

God is Fast Asleep


God is fast asleep—
Unable to recall
What made Him bestow
So much on one
And so miniscule on the others,
Glisten, the green fronds
Awash with the maiden showers,
The waves lap against the shores
to return requited
humming merrily its sibilant whispers,
The silver surf, the golden sand
So very cool, copious and captivating
Busy celebrating their togetherness,
The undulating landscape
of the red earth and the flowing streams
Everything to one but so less to the other,
Not a blade of grass raises its head
The other side, the craggy terrain, the floating sands
The dry beds of a prehistoric stream;

God is fast asleep—
Confused: how one smiles when he’s angry
How one prays without surrender
How one offers so much claiming that his own
How the words and sense travel in parallel
Never to meet, never to be believed
but to be repeated on and on
just for the sake of a rhythmless rhyme
like a chewing gum bereft of sweetness,  
How one thinks himself more intelligent
Than the other eating from the same plate
Sniffing the same breeze and gazing at the same sky;

God is fast asleep—
Clueless: what precious little he can do now
To make them appreciate the obvious meaning
The sun is sun and the stars are stars
The equals they are at a theoretical level
sharing the same firmament
and emitting the same rays,
How to preserve the pleasure of giving
When the dignity of expecting is so forgotten,
How to stop the competition
Nay, the ogling match of the naughty children
To make the others cry while himself smirking,
How to rein in the ambition...and the greed
There’s only so much space on the road
How to let everybody
Run so mindlessly fast;

God is asleep though—
But before going to sleep
He had hit upon an idea
His own little idea
He could not act upon it though
So facilely, the sleep did overpower Him
How to take the frogs out of the well
Rehabilitate, recalibrate them at thinking level
Making them face the world
And see for themselves what the world looks like
And make them know
what the world thinks of them;

Nay, even He is not confident:
Taking the frog out of well
May as well turn a flop show,
Who knows?
There is this second thought though
Even after taking the frogs out of the well
Showing them the Eiffel Tower
Where is the guarantee that they would think sense
And admit that there are object on this earth
Taller than them.

Oh God!
I’ve a suggestion
Suggestion to you the clueless
Still sleeping and dreaming a way out,
One day
You should bring the Himalayas here
And let your children taste
and know for themselves
How distance is measured not in kilometres
But in days and months,
Sweat refuses to trickle while tears flow so facile,
 Sorrows are made to fly
Afar, to the mountain passes past the trails of ravines
Along the lilt of the melody
Wafting past them and beyond
Leaving the souls awash, clean and sparkling,
How muscles dissipate to keep in rhythm
The priceless gift of breath and life,
How belief precedes the prayer
Not the outpouring of greed,
How respect begets love and love the respect
How your bounty is matched
By gratitude, prayer and hope.

Oh God!
Wake up and bring the Himalayas here
Now, at this moment, before it’s too late
The frogs will automatically
Spring out of the water
And make a beeline to the summit
No need to sleep for aeons on end
Just thinking and thinking and abdicating
An ounce of action worth a ton of dreaming.
A. N. Nanda


Thursday, March 26, 2015


जा ते - जा ते 

समझता हूँ मैं जो तुम सोचती हो

अपनी भावना की गठरी से कुछ तो मेरी तरफ़ बिखेरती होंगी  

है कहीं फासला तुम्हारी सोच और मेरी समझ के बीच ?

सब तो आते हैं मेले में,

आखिर मक्सद एक ही होता है

पर पहनावे में फर्क है क्योंकि

पहनते हैं हम जान-बूझकर,

करते हैं औरों को गुमराह

पर तुम जानती हो मेरे आने का मक्सद

और मैं जानता हूँ तुम्हारा ।

आ कर मेले में खाली हाथ लौटना मंजूर नहीं मुझे

तुम्हे भी एतराज़ है यात्रा तुम्हारी निष्फल हो रही है

सजधज कर, फिर घर से इतना दूर !   

चलो, ले लेते हैं एक दुसरे का बोझ

और चल पड़ते हैं अपने-अपने घरों में

अपनी-अपनी चूल्हे-चक्कियाँ करती हैं इंतज़ार....

घर बैठे, उन सबों के साथ

अंतरंगता के वही पुराने पन्नों को सहला कर  

सोचते जाएंगे

मेले में कुछ भूल तो नहीं गए !

समझता हूँ मैं जो तुम सोचती हो

अपनी भावना की गठरी से कुछ तो मेरी तरफ़ बिखेरती होंगी  

है कहीं फासला तुम्हारी सोच और मेरी समझ के बीच ?
A N Nanda



Friday, March 20, 2015

An Eminently Readable Poem

This is a poem in Hindi that came in the February-2015 issue of वागार्थ and I found it eminently readable that provides penetrating insights into the creative process and its motivation. Thought, I could scribble something sensible in the shape of reader's impression. Here is what I could produce. I've the poet's permission to do that.

मेरे गर्भ में चाँद: संवेदनाओं का गुलदस्ता
--ए एन नन्द
सर्जनात्मक अहसास जादुई होता है । वह प्रस्फुटन-सा है, आकस्मिक है, और निस्तब्ध भी । सृष्टि की संभावना घटना-श्रुंखला के रूप में वास्तविकता की सतह पर दस्तक देने के एक पल पहले तक भी सृष्टि कर्ता को इसका पूर्वानुमान शायद ही होता होगा । फिर भी स्रष्टा अपनी सृष्टि का पूरा-पूरा श्रेय लेना चाहता है । सृष्टि के समय जो वेदना होती है और उसके उपरांत अपने निर्माण के साथ जो लगाव होने लगता है तथा उस आत्मतुष्टि का बोध जो उसे अभिभूत कर देता है—उन सबके निचोड़ को ही सृजनात्मकता का नाम दे देता है ।

केवल वेदना और लगाव, दोनों सृजनशील परितंत्र का विधान नहीं करते हैं । इसको समझने के लिए कुछ ख़ासी योग्यता की आवश्यकता होती है । क्या दुनिया की सभी माताएँ यीशु, कान्हा, शुद्धोदन जैसी आत्माओं को जन्म देती हैं? क्या सबकी लेखनी से “कफ़न” और “काबुलीवाला” जैसी कहानियाँ निकलती हैं? क्या सबके गुनगुनाने पर “एकला चलो रे” और “देहि पदपल्लवमुदारम्” जैसी युगांतकारी पंक्तियाँ रची जाती हैं? सृष्टि के रहस्य को वही समझ सकता है जो सृजन के समय दृश्यपटल में होने वाले हर परिवर्तन को भाँपने में सक्षम है, जिसको सृष्टि के हर मकसद के बारे में जानकारी हासिल है, जो विशाल सृष्टि में स्रष्टा की अहमियत को प्रत्यक्ष समझ सकता है । आसमान में तारों का अभूतपूर्व ढंग से चमकना, स्वर्ग से पुष्प वृष्टि होना, बंदियों के पैरों से बन्धन एकाएक खुल जाना, बेवक्त चमेली का महकना—ऐसे जादुई संयोग भी सृष्टि का अटूट हिस्सा हैं ।
शेफाली की कविता “मेरे गर्भ में चाँद” ने कुछ ऐसी भावनाओं को उजागर किया है । मानव का आविर्भाव कुदरत के लिए भी हर्ष लाता है यानी यह कुदरत की करिश्माई उपलब्धियों में से अनन्य है । एक साधारण मानव इस सृष्टि प्रक्रिया का माध्यम हो कर असाधारण बन जाता है, उसका डूबता सितारा बुलंद होता है, उसे अमावस की रात में भी आसमान आलोकित मिलता है । नश्वरता के अहसास से भयभीत मानव जब सृष्टि के इस रहस्य को समझने लगता हे, जन्म-मृत्यु उसे निरंतरता बनाए रखने की कुदरती रीति के रूप में दिखाई देती है । वह अपनी संतति के माध्यम से जी कर मृत्यु को परास्त करने की अपनी शक्ति से रूबरू हो जाता है । अपनी कहानी, कवितायों को शस्त्र बना कर विस्मृति के आक्रमण को प्रतिहत करना सीख जाता है। 

कविता की भाव-चेतना मानव की सामग्रिक स्थिति को लेकर ही है जहाँ दुनिया के तमाम बच्चों को विहँसना होता है, माँओं को एकत्र होकर मातृत्व की हिमायत करनी होती है, चारों ओर मुस्कराहट, किलकारियों की गूँज से परिवेश मुखरित होता है और तब जाकर आस्था की परिभाषा मानवीयता के अनुकूल बन जाती है । मातृत्व कोई शर्मिंदगी नहीं; यह वर्तमान व भविष्य के बीच सेतु है, विवर्तन का मधुर संगीत है एक अर्थ में, यह प्रचलित दुनिया में अपना-पराया भाव, क्रूरता, लिंग-भेद आदि संकीर्ण प्रवृति की भयावहता से बच्चों को दूर रखने का संकल्प लेता है, इस कदर अशिष्ट व्यवहार सिखाने वालों को किलकारियों से, लोरियों से और मुस्कराहटों से मुग्ध कर जीने की असली सीख देता है और वे लोग मस्जिद-गिरजा-मंदिरों से निकल कर सृष्टि कर्ता के सामने सिर झुका लेते हैं ।

इस सामग्रिक स्थिति के भाव को लेकर कवयित्री ने और एक दिशा की ओर इंगित किया है । यह सूक्ष्म रूप से क्यों न हों, पर संकेत कन्या भ्रूण हत्या की ओर है । इसलिए माँओं को एकजुट होकर आँचल फैलाना पड़ता है ताकि उन निर्बल आत्माओं को समूह-संहार से बचाया जा सके । यह बिन ब्याहे मातृत्व की ओर भी इंगित करता है जिसके नाते भयंकर पीड़ा से तड़पती माता को समाज छोड़ कर जंगल जाना पड़ता है पर माँओं का सहारा उसे जीने के लिए प्रेरित करता है
भावनाओं की गहराई से अपना पोषण लेने वाली कविता जब कभी शब्दों के उथले सतह में दिखाई पड़ती है, हम उसको पकड़ने की कोशिश करते तो हैं, पर कामयाबी कभी-कभार मिलती है । इस रहस्यमयता के चलते कविता विधायों में श्रेष्ठ कहलाती है । शेफाली की कविता “मेरे गर्भ में चाँद” तात्पर्य से भरी है, रूपकात्मक है और पहली पंक्ति से लेकर अंत तक बेहद सार-गर्भित है ।
दिनांक 20-03-2015

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Tuesday, March 10, 2015


                    D o l d r u m s

Something is cooking behind the screen!
A strange feeling overtakes me
There’s no assurance, no guarantee
Yet I’m building a castle brick upon brick.
I’m afraid to imagine the end
End makes redundant the living present
Just a new bark to cover the deadwood
And cover it for good
I don’t know, don’t have a clue.
No smell wafts across
Nobody whispers a word
Nothing casts a shadow, no footfalls heard
Aha! It’s not a spell of doldrums
It’s the lull before the storm
Preparation is afoot, perhaps
For the next scene
That’s the safest guess.
What’s that, so elaborate?
Trying to adjust the next occurrence
Just to suit my present?
To join from where I’ve left?
Or to contrast,
A fresh coat of pigment after a whitewash?
A meaningful sequence of sorts
Yet very random, with no rhyme, no reason?
Really, I don’t know, don’t have a clue
A rationale is ready for everything opposite
The higher logic to make possible everything.
Why things behind the scene so secret?
Surprise: that’s the name of the game
A pleasant surprise of sorts, or a rude shock
And the name of the game is cheating.
A. N. Nanda