The Unadorned

My literary blog to keep track of my creative mood swings with poems n short stories, book reviews n humorous prose, travelogues n photography, reflections n translations, both in English n Hindi.

My Photo
Name:

I'm a peace-loving married Indian male on the right side of '50 with college-going children, and presently employed under government. Educationally I've a master's degree in History, and another in Computer Application. Besides, I've a post graduate diploma in Management. My published works are:- (1)"In Harness", ISBN 81-8157-183-5, a poetry collections and (2) "The Remix of Orchid", ISBN 978-81-7525-729-0, a short story collections with a foreword by Mr. Ruskin Bond, (3) "Virasat", ISBN 978-81-7525-982-9, again a short story collection but in Hindi, (4) "Ek Saal Baad," ISBN 978-81-906496-8-1, my second Story Collection in Hindi.

Monday, November 03, 2014

कमरा नंबर तीन

-----------------------------------
If you have gone through my English story "Room Number Three" at this L I N K, its original Hindi version is here. This one is one of the thirty stories I included in my book "वि रा स त". At least four magazines I know of who have by now published this particular story. I remember one editor of a reputed magazine wrote to me that he was impressed with the story but was unable to publish it because he's "Janavaadi" whereas this story of mine has ghost characters. Then I came to know that some well-wisher of mine had submitted the story to him on my behalf. Anyway, being challenged by such a comment, I had written another story sequel "कमरा नंबर साढ़े तीन" that I published in my next book "एक साल बाद". The characters remain same but that story has many more ghost characters than "कमरा नंबर तीन" and more of creepy activities. One of these days I'll bring that onto my blog but until then read this.
---------------------------------

सैलानियों का शहर मुरी । इसकी गिनती देश के नामी-गिरामी पहाड़ी सैरगाहों में होती है । लोग अपनी छुट्टियाँ मनाने यहाँ दौड़े चले आते हैं--कोई आता है एक सप्ताह के लिए सिर्फ़ मन बहलाने, तो कोई लंबी छुट्टी लेकर अपनी सेहत बनाने । अप्रैल महीने से भीड़ शुरू हो जाती है और इसकी तादाद गर्मी में काफ़ी बढ़ जाती है । कुछ लोग तो हर साल आते हैं, क्योंकि मुरी का प्राकृतिक सौंदर्य लोगों को यहाँ खींच लाता है ।

मुरी में डाक विभाग ने अपने कर्मचारियों के लिए अच्छा-खासा इंतज़ाम कर रखा है । वहाँ के विभागीय गेस्ट हाउस की तो शहर के सबसे सुंदर मकानों में गिनती होती है । नक़्क़ाशीदार ड्योढ़ी, छज्जेदार झरोखे, रंग-बिरंगे काँचों से लैस पट्टीदार खिड़कियों से सजे इस भवन की चर्चा तो अक्सर लोगों से सुनने को मिलती रहती है । कम से कम सौ साल की यह पुरानी कोठी, अँग्रेज़ ज़माने की ही होगी । वह तब बनी थी जब कंक्रीट नाम की चीज़ नहीं के बराबर थी । लोग सुर्ख़ी, चूना और गुड़ से बनने वाले लेई से घर की छत बनाते थे । छत लोहे-लकड़ियों के धरण के ऊपर सिर्फ़ लादी जाती थी ।

इस कोठी का मालिकाना एक अँग्रेज़ से एक मारवाड़ी के पास गया; फिर यह एक बंगाली सज्जन से होकर आख़िर में डाक विभाग के पास आया था । ख़ैर, पिछले चालीस साल से विभागीय मकान की तरह इसका रखरखाव किया जाता है । कई बार अधिकारियों ने सोचा कि इस पुरानी इमारत को तोड़कर उसके स्थान पर एक आधुनिक भवन बनवाया जाए, परंतु डाक विभाग में पौराणिक धरोहरों को बड़ी इज़्ज़त मिलती है । सभी यही सोचते हैं, 'बस, इसे तब तक रहने दो, जब तक इससे ख़तरों का आभास न मिले ।

इस भवन को अपने पुराने ढाँचे के साथ रखे जाने की एक और वजह है । यह है इसके साथ जुड़ी मज़ेदार भूत-प्रेतवाली कहानियाँ। अक्सर विभाग में पुराने लोग नए कर्मचारियों को ये भूत-प्रेतवाली कहानियाँ खूब सुनाते हैं । एक बार तो एक पुरुष अधिकारी ने अपनी महिला सहकर्मियों को भूत की कहानी सुनाकर इस क़दर डराया था कि वे लोग अब मुरी आने पर उस गेस्ट हाउस में ठहरतीं ही नहीं । महँगा होटल ही सही, पर वो भूतवाली कोठी ? ना बाबा ना, इसे दूर से प्रणाम ।

अगर थोड़ी सी खोज की जाए तो ये कहानियाँ सरासर झूठ निकलेंगी । सिर्फ़ एक सवाल पूछने पर सारी बात साफ़ हो जाती है, जैसे कि, 'क्या आपने कभी यहाँ भूत के साथ एक भूतनी भी देखी है ?’ जवाब में कोई बोलेगा एक भूत तो ज़रूर है और कोई बोलेगा भूत के साथ एक भूतनी भी है । कोई बोलेगा भूतनी एक बंगाली महिला जैसी साड़ी पहनी रहती है, तो कोई बोलेगा वह सलवार कुर्ता पहनकर निकलती है । जितने मुँह उतनी बातें । ऐसे ही लोग तत्क्षण कहानी बनाते हैं, उसे सुधारते हैं---बिल्कुल कहानीकारों की एक टोली जैसी ।

शमीम डाक विभाग में ऑफ़िसर की नौकरी पर नया-नया दाख़िल हुआ था । प्रशिक्षण संस्थान में उसे एक दिन अपने प्रशिक्षक से मुरीवाले गेस्ट हाउस और उसके साथ जुड़ी कहानियों के बारे में पता चला । उसे इन भूत-प्रेतवाली बातों पर बिल्कुल विश्वास न था । किसी मज़हब के लिहाज़ से वह इन बातों को नकारता नहीं था, बल्कि था वह सचमुच एक साहसी नौजवान जिसे अंधविश्वास से सख्त चिढ़ थी।

शमीम के मन में एक दिन बात आई की क्यों न इस गेस्ट हाउस को देख लिया जाए ? ‘दूर से तो इतनी बातें सुनाने को मिलाती है मगर, वहाँ जाकर क्या-क्या देखने को नहीं मिलेगा?

मुरी गेस्ट हाउस में जिस दिन शमीम पहुँचा, उस दिन वहाँ और कोई नहीं था सिवाय वहाँ के केयरटेकर के । वहाँ पहुँचकर वह अपने लिए आरक्षित कमरा नंबर 3 में दाखिला हुआ । रूम के अंदर साज-सामान साफ़ और सही जगह पर रखे हुए थे। नवंबर का महीना था और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । शमीम ने कंबल वगैरह को परख लिया तथा तसल्ली कर ली कि रूम में रहने में किसी प्रकार की कोई दिक़्क़त नहीं होगी ।

कुछ देर बाद केयरटेकर शमीम से मिलने आया । दरवाज़े के पास एक मिनट के लिए ख़ामोश खड़ा रहा । उसके खड़े रहने के ढंग से शमीम को पता चला कि वह कुछ कहना चाहता है । अपनी तरफ़ से पहल करने की बजाय उसने उसके बोलने का इंतज़ार किया ।

'हुज़ूर, आज रात मेरे रिश्तेदार के यहाँ शादी है । अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं सिर्फ़ आज रात के लिए अनुपस्थित रहना चाहता हूँ ।

शमीम ऐसे ही एक अवसर की तलाश में था । उसे पूरे गेस्ट हाउस में सन्नाटा चाहिए था । प्रचलित वहम के अनुसार भूत हो या भूतनी, वे सब ऐसी ही सुनसान रात में बाहर निकलते हैं । अगर यह भूतवाली बात अफ़वाह है तो इतने सारे सन्नाटे के बावजूद कोई भी नहीं निकलेगा । कुल मिलाकर शमीम को एक अनुभूति हासिल करनी थी, जिसके सहारे वह खुद एक निष्कर्ष पर पहुँच सके और कल जब किसी से बहस करनी हो तो वह खुद अपनी अनुभूति को सबूत के तौर पर प्रस्तुत कर सके ।

'हाँ केयरटेकरजी, आप बेशक जा सकते हैं । आज रात के लिए सिर्फ़ एक डबल रोटी रखकर जाइए, मैं काम चला लूँगा ।ऐसा कहकर शमीम ने केयरटेकर को घर जाने की इजाज़त दे दी।

केयरटेकर ख़ुश हुआ और अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए लौट गया । जाते-जाते उसने शमीम की तरफ़ एक ऐसी रहस्यभरी नज़र से देखा, मानो वह उसके ऊपर तरस खा रहा हो । शमीम इस पर ध्यान नहीं दे पाया । अब तो उसका दिमाग़ भूत-बैतालों में उलझ चुका था ।

थोड़ी देर में शाम उतर आई । अँधेरा पसरने लगा । जाते समय केयरटेकर ने बरामदे और आँगनवाली सभी लाइटें जला दी थीं । शायद वह जानता था कि उजाले में भूत-प्रेत गेस्ट हाउस में नहीं आएँगे । पर केयरटेकर के जाने के तुरंत बाद शमीम ने सभी लाइटें बुझा दीं । रेडियो व टी. वी. कुछ भी खुला नहीं छोड़ा । मोटे तौर पर शमीम कुछ अजिबोगरीब  घटने के लिए अनुकूल स्थिति बनाए रखना चाहता था और भूत-प्रेतों की प्रतीक्षा कर रहा था ।

धीरे-धीरे रात गहरी होती गई । इस प्रकार रात के दस बज गए । एक कार गेट के सामने आकर रुकी और हॉर्न बजने लगी । केयरटेकर तो था नहीं, फिर कौन जाता गेट खोलने ? दरअसल गेट में ताला नहीं लगा था, पर ज़ंजीर से ताले को ऐसे लटकाया गया था कि कोई भी इस भ्रम में पड़ जाए कि गेट बंद है । मजबूरन शमीम को लाइट जलाकर गेट तक आना पड़ा । गेट खोलने पर टैक्सी अंदर आई ।

शमीम मन-ही-मन रुष्ट था कि अब उसकी सारी योजनाएँ चौपट हो गइर्ं । सोचने लगा, 'अब कोई भूत या भूतनी नहीं आने वाला, पर क्या किया जा सकता है ? यह तो एक गेस्ट हाउस है और लोगों का आना-जाना तो स्वाभाविक है । चलो आज नहीं सही, फिर कभी ।

जब उसने गेट से लौटकर बैठकख़ाने में प्रवेश किया तो देखा कि केयरटेकर भी लौट आया था । वह भी दुखी था क्योंकि वह अपने रिश्तेदार के यहाँ जा नहीं पाया । उसे ख़बर भेजी गई कि तुरंत वह गेस्ट हाउस लौट आए, क्योंकि एक बड़े ऑफ़िसर की बेटी और जमाई बाबू वहाँ रहने के लिए आने वाले थे ।

शमीम दोनों नवागतों से दूर तो रहना चाहता था, पर वे लोग बड़े मिलनसार निकले । एक का नाम था प्रेम और उसकी बीवी का नाम यामिनी । यामिनी को बेहद पसंद था मुरी, ख़ासकर मुरी का यह गेस्ट हाउस । बरसों पहले अपना हनीमून उन दोनों ने इसी गेस्ट हाउस के कमरा नंबर तीन में मनाया था ।

'कमरा नंबर तीन ? वहाँ तो मैं ठहरा हुआ हूँ ।शमीम बोला ।

'कोई बात नहीं, शमीम साहब, हमलोग कमरा नंबर दो में रह जाएँगे,’ यामिनी बीच में बोल पड़ी । बड़ी प्रसन्नता के साथ उसने यह बात रखी । लगा जैसे वह शमीम के व्यक्तित्व के अंदर झाँककर महसूस कर लेना चाहती हो कि डाक विभाग का यह युवा अधिकारी प्रेम को कितना महत्व देता है । बिजली बल्ब की क्षीण रोशनी में यामिनी के चेहरे से एक आकर्षक आभा निकल रही थी, लगता था कि वह फिर से हनीमून के लिए सज-धज कर निकली है।

शमीम ने एक मिनट के लिए सोचा कि उसे इतना ख़ुदर्ग़्ज़ा नहीं होना चाहिए । अब उसे मालूम हो गया था कि प्रेम और यामिनी के लिए कमरा नंबर तीन कितनी अहमियत रखता है । हर साल दोनों उसी दिन इस गेस्ट हाउस में आते हैं इस उद्देश्य के साथ कि यहाँ कमरा नंबर तीन में ही ठहरेंगे और अपने हनीमून की याद ताज़ा करेंगे । समय तो लौटकर नहीं आएगा । बस यादें थीं, जिन्हें वे एक रात जी लेंगे । शमीम ने फिर सोचा, 'अब तो मुझे प्यार का कुछ लिहाज़ करना चाहिए।

'प्रेमजी, आप निश्चिंत रहिए । मैं कमरा नंबर तीन आप दोनों के लिए ख़ाली कर देता हूँ । बस दो मिनट ।शमीम बोला ।

शमीम ने फ़ौरन अपना रूम बदल दिया । उसे मिला कमरा नंबर दो और पति-पत्नी ठहरे कमरा नंबर तीन में । अब वे लोग अपनी रूमानी यादें ताज़ा करेंगे; इसमें किसी से कोई रुकावट नहीं ।

फिर बीस मिनट बाद प्रेम ने शमीम का दरवाज़ा खटखटाया । दरवाज़ा खोलते ही वह अंदर आया और शमीम को अपने कमरे में आने का न्योता दिया । वह चाहता था कि उस सुअवसर पर शमीम भी टोस्ट में शामिल हो ।

शमीम को कोई एतराज़ न था, बल्कि उसने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया । उसका मन रूमानी भावनाओं में बहने लगा । उसने सोचा, 'यामिनी जैसी औरत को बार-बार देखने से भी किसी की तबियत नहीं भरेगी !सचमुच उसके अंग-अंग में भरी मदिरा शमीम अपनी आँखों से बार-बार पी लेने को बेताब था । घटना चक्र अब एक अजीब-सा मोड़ ले रहा था--एक खोज का अभियान आसक्ति के गलियारे से होकर गुज़र रहा था ।

रूम नंबर तीन । इसे खुद शमीम पहचान नहीं पाया कि सिर्फ़ बीस मिनट पहले वह वहाँ ठहरा था । कमरे के अंदर लाल-हरे रंगों की लाइटें थीं और उस धीमी रोशनी में यामिनी आसमान की एक परी-सी पलंग पर विराजमान थी । टेबुल पर थे तीन ग्लास और ग्लासों में जॉनी वाकर छाप की लाल शराब । शमीम अंदाज़ नहीं लगा पाया कि ग्लासों में भरी लाल शराब ज़्यादा नशीली थी या यामिनी का मदिर-मस्त यौवन !

प्रेमजी ने अपना ग्लास उठाया और टोस्ट का प्रस्ताव रखा, '150वाँ  हनीमून रंगीन हो।

शमीम चौंक गया । 150वाँ हनीमून ! क्या कोई 150वाँ  हनीमून मना सकता है ? पर शिष्टाचार और औपचारिकता का ख़्याल रखते हुए उसने उस टोस्टवाली बात को संक्षेप में दोहराया, 'हनीमून रंगीन हो ।

शायद यामिनी शमीम के मन का असमंजस समझ गई । बोलने लगी, 'क्या आप 150वाँ सालवाली बात समझ नहीं पाए ? क्या आप भूल गए कि डाक विभाग इस साल अपनी 150वाँ सालगिरह मना रहा है ?’

यामिनी की बात सुनते ही शमीम को अपने भुलक्कड़पन के बारे में महसूस होने लगा और वह ख़ूब हँसा । दूसरी पेग लेते हुए वह बुलंद आवाज़ में बोला, '150वाँ साल का  हनीमून रंगीन हो ।

पीने और पिलाने का सिलसिला आधी रात तक चलता रहा । शमीम को पता नहीं चला कि उसने कितनी पेग पी ली । नशे में उसका संकोच डूब गया । वह अपना मर्यादा भूलकर सिर्फ़ यामिनी को अपलक निहारने लगा । इस दर्मियान यामिनी भी नशे में चूर हो गई थी । कुछ देर बाद वह अपनी साड़ी भी सँभाल न सकी । पर पीने की इस प्रतियोगिता में कोई हारना नहीं चाहता था ।

शमीम को पता न चला कि कब वह नशे में बेहोश हो गया । सिर्फ़ इतना याद रहा कि वह यामिनी के मख़मली जिस्म के बहुत क़रीब पहुँच गया था ।

सुबह जब केयरटेकर आया तो देखा कि रूम नंबर तीन में शमीम फ़र्श पर पड़ा हुआ है । उसने पास आकर उसको जगाया । शमीम की नींद खुली, पर चक्कर आने से वह खाट पर फिर लेट गया ।

अपराह्न तक शमीम का नशा उतर गया । नींद से जागकर उसने अपने को कमरा नंबर तीन में सोया हुआ पाया । फिर उसने केयरटेकर को बुलाया और प्रेम और यामिनी के बारे में पूछने लगा।

सब सुनकर केयरटेकर ने एक बनावटी मुस्कराहट के साथ बोला, 'तो इस साल भी वे दोनों प्रेम और यामिनी नाम से यहाँ आए थे!

'कौन थे ये दोनों ?’ शमीम ने पूछा । वह अब पूरी बात सुनने को बेताब था ।

अंत में उसे मालूम पड़ा कि पिछली रात जो तीन शख़्स गेस्ट हाउस में आए थे, वे तीनों के तीनों भूत थे । उनमें एक तो केयरटेकर का रूप लेकर आया था क्योंकि असली केयरटेकर तो अपने रिश्तेदार के यहाँ शादी के बहाने चला गया था । उसे मालूम था कि उस दिन भूत आएँगे और उसने भाग जाने की योजना बना रखी थी । शमीम को इसकी भनक तक नहीं मिल पाई ।

तर्कप्रिय शमीम सोचने लगा कि आख़िर एक भूतवाली पार्टी और एक जीवितोंवाली पार्टी के बीच क्या कोई फ़र्क़ है ?
-------------------
ब्रह्मपुर,  दिनांक 23-08-2007
------------------
By
A N Nanda
Shimla
03-11-2014
-------------------

Labels: , ,

3 Comments:

Anonymous Anonymous said...

This comment has been removed by a blog administrator.

10:35 PM  
Anonymous राजेशवरी गौतम said...

सर, कहानी में एक तिलिस्म सा अंत तक बराबर बना हुआ है। आपने बड़े सहज से घटनाक्रम को रोचकता में पिरो कर एक जीवित पात्र की पार्टी भूतों के साथ आयोजित करवा दी !अविश्वसनीय ! हम लोग सीमित मेधा के साथ आपकी कृतियों को शायद पूरी तरह समझ भी नहीं पाते हैं। ससम्मान !

10:10 PM  
Blogger Anant Nanda said...

धन्यवाद राजेश्वरी जी । भूतों को भारी-भरकम कारनामों में भाग लेने देना सृजनशील तथा उदार इंसान का लक्षण होता है । पर यह गूढ़ तथ्य को समझे बग़ैर कुछ जनवादियों ने इस कहानी के लिए मेरी आलोचना भी की थी । इसके जवाब में मैंने "कमरा नंबर साढ़े तीन" कहानी मेरे परवर्ती कहानी संग्रह "एक साल बाद" में सामिल की थी । कहानी लम्बी है और इसलिए अब तक मैंने इसे ब्लॉग में नहीं डाला, फिर भी उस बात को ध्यान में रख कर मैंने "कमरा नंबर साढ़े तीन" लिखी थी, जो मुझे "कमरा नंबर तीन" लिखने हेतु प्रेरित किया था ।
मेरे हिसाब से एक बात पर इंसान को अवश्य ध्यान देना चाहिए--इंसान सृष्टि का सबसे उत्कृष्ट जीव हो सकता है, परन्तु यह कोई ज़रूरी नहीं कि उससे हमेशा सही कार्य होता ही जायेगा । अगर भला करने के लिए निरंतर कोशिश करने के बावजूद गलती हो जाती है तो यह सबूत है कि हमें और जीव-जानवरों से, और तत्वों से भी सीखना होगा । सो, भूतों से सिखने में, उनसे सुख-दुःख बांटने से भला हर्ज़ क्या ?

7:13 PM  

Post a Comment

Links to this post:

Create a Link

<< Home