The Unadorned

My literary blog to keep track of my creative mood swings with poems n short stories, book reviews n humorous prose, travelogues n photography, reflections n translations, both in English n Hindi.

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I'm a peace-loving married Indian male on the right side of '50 with college-going children, and presently employed under government. Educationally I've a master's degree in History, and another in Computer Application. Besides, I've a post graduate diploma in Management. My published works are:- (1)"In Harness", ISBN 81-8157-183-5, a poetry collections and (2) "The Remix of Orchid", ISBN 978-81-7525-729-0, a short story collections with a foreword by Mr. Ruskin Bond, (3) "Virasat", ISBN 978-81-7525-982-9, again a short story collection but in Hindi, (4) "Ek Saal Baad," ISBN 978-81-906496-8-1, my second Story Collection in Hindi.

Saturday, May 08, 2010

Feedback on "Virasat"

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I thought I could post a few comments as I recently received on my book "Virasat". They have come to me either as letters or through the reviews in various magazines and newspapers. It is quite nice of all those people to have read my book and shared their encouraging comments. Thank you one and all.
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हिंदी में यह [विरासत] अपनी तरह की अलग किताब है। पुस्तक में लिखित सभी कहानी मानव संबंधों को बड़े सारगर्भित ढंग से चित्रण करती है। नन्द जी एक मंझे कथाकार हैं जो सूक्ष्म पर्यवेक्षण, निरीक्षण करते हुए पुस्तक की कहानियाँ धीरे-धीरे आगे-आगे बढ़ाते हैं। एक उडिया भाषी हिंदी के प्रमुख कथाकार के रूप में उभरे यह दुर्लभ संयोग है। --- यसस्वी कवि साहित्य अकादेमी एवार्ड (1998) से सम्मानित श्री अरुण कमल

पुस्तक की सभी कहानियाँ डाकघर और इससे जुड़े लोगों की दुनिया के छुए-अनछुए पहलुएँ, उनके कार्य-व्यापर और उनकी जीवनचर्या का ऐसा दस्ताबेज है जो पाठक को लुभाती है। ओडियाभाषी होने के बावजूद कहानीकार . एन. नन्द का हिंदी प्रेम ही है जो उन्हें हिंदी में कहानियाँ लिखने को प्रेरित करता है। श्री नन्द अपनी तीस कहानियों के माध्यम से 165 साल पुरानी डाक व्यवस्था के उन ऐतिहासिक और मानवीय पलों को सहेजा-समेटा है, जिनके बीज, फल-फूल और खुशबू आज भी डाकघरों एबं डाक-जीवन का मार्मिक दस्तावेज़ है। -------------
डा ध्रुव कुमार, "नई धारा" अक्तूबर-में 2009

लेखक का अहिन्दीभाषी होना हिंदी साहित्य सृजन में अड़चन नहीं बना है। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए वह भी डाक विभाग की भाग दौड़ की ज़िन्दगी में इतना समय निकालकर रचनात्मक साहित्य प्रस्तुत करना अदम्य साहस का काम है। कहानी की भाषा सरल एवं प्रभावी है।----
"प्रभात खबर" 28-11-2009

मैंने पुस्तक को आद्यांत पढ़ा। प्राय: सभी कहानियों की कथावस्तु वास्तविक जीवन से सम्बंधित है, जिस पर कथाकार लिखते रहते हैं, परन्तु डाक विभाग के कर्मचारियों, उनके कार्य-वातावरण, एवं उनके जीवन से सम्बंधित समस्याओं पर किसी ने कलम नहीं चलाई। आपने इस विषय को कथाक्रम में गुम्फित कर प्रशंसनीय काम किया है। आपकी भाषा और शैली सरल, सहज और संग्राह्य है.----
जिया लाल आर्य, आईएस (सेवा निवृत)

आप द्वारा प्रकाशित कराया गया "विरासत" प्राप्त हुआ, पढ़ कर मन अत्यधिक प्रसन्न हुआ कि आपने प्रशासन में पदस्थ रहते हुए भी सुक्ष्म परिदृश्यों को रोचक भाव-
अभिव्यक्ति में सजोंकर उत्तम कहानियों को प्रस्तुत किया है, उक्त के लिए पाठक / समाज आपकी ऋणी रहेगा। प्रति संग्रहनीय है। ----सिया राम 'भारती', निरीक्षक सी. एल. दी. कानपूर

आपने अहिन्दीभाषी होने के बावजूद जिस खूबी और अलंकारिता से सरल हिंदी में अपनी कहानियाँ प्रस्तुत कीं, वे चमत्कृत करने वाली कहानियाँ डाक विभाग पर केन्द्रित हैं, यह और अद्भुत है। ---
दिनांक 06-09-2009 मयंक कुमार, सिकर्हुला, बेगुसराई-851127.

इसकी [विरासत की] रोचकता इसके विषय-वस्तु, किस्सागोई वाली शैली और भाषा तथा संवाद के चुटीलेपन में है। पता नहीं, उड़िया भाषी अंग्रेजी-हिंदी के कवि-कथाकार राजा राधिकारमण सिंह, रामबृक्ष बेनीपुरी, कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' को पढ़ा है या नहीं, लेकिन "विरासत" को पढ़ते हुए उनकी चमत्कारिक शैली उन मुर्धन्य शिलीकारों की याद दिला देती है। ------
श्री कीर्तिनारायण मिश्र, 1997 साहित्य अकादेमी एवार्ड से सम्मानित, मैथिली कवि

किसी एक निर्दिष्ट विभाग को लेकर यानी डाक विभाग पर एक कहानी
संग्रह प्रकाशित करना इस पुस्तक की सिर्फ एक ही खासियत नहीं है, बल्कि कहानियों में जाने-पहचाने पात्रों ने इसे खास बनाया है। हल्का व्यंग्य के साथ समाज में घट रही घटनाओं को इन कहानियों में बड़े दिलचस्प ढंग से प्रतुत किया गया है ।----- [ओडिया अख़बार "संवाद" से अनुदित की गई है, दिनांक 7-6-2009 ]

कहानियाँ इस ढंग से प्रस्तुत की गई हैं कि पाठकों की उत्सुकता प्रारंभ से बनी रहती है और एक अद्भुत-प्रभाव पाठकों के मन-मस्तिस्क पर छोड़ जाता है। इस कृति के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं।------
श्रीमती गिरिजा बरनवाल, एम्. . (का. ही. वि. वाराणसी), जनवरी-मार्च अंक - 5 "नया भाषा-भारती-संवाद", पटना

दरअसल नन्द की कहानियाँ छदम विकास व्यवस्था के क्रूर और अमानवीय होने की त्रासदी बयान करती है, जो हमारे समाज के यथार्थ को रेखांकित करती हैं। ----प्रसिद्ध कथाकार सामुएल अहमद

कथा शिल्प की दृष्टी से वस्तुत: "विरासत" कथा संग्रह एक थाल में परोसी गई विभिन्न रसास्वादन वाले मिस्टान्न के समादृश है जिसे केवल रूप सज्जा या वहिर कलेवर देखकर उनके बखूबी खासियत का अंदाजा नहीं लगाए जा सकते हैं, बल्कि इनके अंत: निहित रसास्वादन सुधि पाठक खुद इन्हें पढ़कर ही अहमियतता की बखान कर सकते हैं कि वाकई यह कितनी सुन्दर है। ----चंद्रिका प्रसाद राय 'अमात', ग्राम- गुनवंती, अररिया, पिन - 854312

"विरासत" के रचनाकार ने अपने अनुभव को पाठक के अनुभव से जोड़कर कृति को काफी लोकप्रिय बना दिया। --- डाइम्तियाज़ अहमद, निदेशक खुदाबक्स लाइब्रेरी

"विरासत" की सारी कथाएँ मन को छू जाती हैं। कुछ तो दिल की गहराइयों में उतर कर उसमें जगह ले लेती है। ---प्रोफेसर गोपबंधु मिश्र, संस्कृत विभाग, बनारस विश्वविद्यालय

आपकी लिखी हुई "विरासत" कहानी संग्रह पढ़ी। सभी कहानियाँ अच्छी हैं, लेकिन मुझे 'डाकमणि', 'ज्वालाराम पकोड़ेवाला' और 'सुवेदार और ज़मींदार' अच्छी लगी। आपने सभी कहानियों में मानवीय संवेदनाओं को उजागर किया है।----डी पी राजपूत, अधीक्षक महेसाना मंडल, गुजरात

"विरासत" के कथानक एवं कथ्य ने बड़े पैमाने पर साहित्य-सुधिजन को प्रभावित किया हैउनकी भाषा 'हिंदी' होना तब और भी आकर्षित करती है, जब लेखक की मातृभाषा हिंदी नहीं हैऔर दूसरी ख़ास बात यह कि जिस पृष्ठभूमि में सारे पात्र अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं --'डाक'-- वह द्वितीय है--- पंकज कुमार मिश्र, प्रवर अधीक्षक, छपरा-841301

"विरासत" के केंद्र में डाकघर है, पर मानव का पूरा जीवन इसमें हैइसमें डाकमणि की कहानी एक ऐसी कहानी है जो आपकी चेतना को जाग्रत कराती हैलेखक ने समाज की विरूपता व्यंग्यात्मक ढंग से अनूठा चित्रण किया है --- डा जीतेंद्र सहाय

नन्द जी उडिया लेखक होने के बाद हिंदी में जिस 'विरासत' की रचना की है उसे देख नहीं कहा जा सकता कि यह अहिन्दी भाषी लेखक की कृति है। ---व्यास जी, आई ए एस, श्रम सचिव बिहार सरकार
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By
A. N. Nanda
Muzaffarpur
8-5-2010
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1 Comments:

Blogger DR. ARVIND VERMA said...

I HAVE READ VIRASAT, WHICH IS WRITTEN BY A.N.NANDA,PMG,NORTH,MUZZAFFARPUR
THIS BOOK IS MOST USEFUL TO ALL POSTAL EMPLOYEE AND HIS FAMILY MEMBERS ALSO.
IN THIS BOOK ALL THIRTY HINDI STORIES i.es- VIRASAT, BADSAH, IJJAT, BAJIGAR, INSAF KE LIYE AND DAKMANI IS LIKE MILE STON OF POSTAL EMPLOYEES AND OTHERS OF SOCIETY.
- Dr. ARVIND KUMAR VERMA,
CHAIRMAN
POSTAL SOCIETY OF INDIA
CENTRAL OFFICE-KHAGARIA
PIN- 851204 ( BIHAR)
MOBILE - 9431417361
PLACE- KHAGARIA DATE- 06.03.2011

6:16 AM  

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