The Unadorned

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Friday, November 28, 2025

सवाल और सन्नाटा


 

सवाल और सन्नाटा

प्रभाकर पचपन बरस का हुआ, तभी उसे पहली बार सचमुच महसूस हुआ कि उसकी ज़िंदगी चुपचाप बीत गई है—यूँ लगा जैसे साल दर साल उसकी मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते रहे हों, और वह खुद यह भी न देख पाया हो कि कौन-सा दिन सुखद था और कौन-सा दुःखद। अपनी ज़िंदगी में वह कोई ऐसा बड़ा काम कर ही नहीं पाया था, जिसे वह आत्मकथा में गर्व से दर्ज कर सके। फिर भी, एक बात वह पक्के तौर पर जानता था—जब लोग “अच्छे इंसान” की मिसाल देंगे, तो उसे अपनापन से याद करेंगे।

वह कुंवारा था, रिटायर्ड स्कूल टीचर, और इतना सादा कि उसका पूरा पहनावा एक तकिए के खोल में आ जाए—एक नीली कमीज़, एक काली पैंट, और रबर की ऐसी घिसी-पीटी चप्पलें कि अगर उन्हें भी आह भरने की अनुमति मिलती, तो शायद भर देतीं।

उसने अपनी आधी से ज़्यादा उम्र उस दिन की प्रतीक्षा में गुज़ार दी, जब उसका छोटा-सा प्राइवेट स्कूल सरकारीकरण होकर उसे पक्की नौकरी, नियमित वेतन और सरकारी कर्मचारी की मान्यता देगा। वह दिन आया भी—मगर दस साल देर से। और जब तक सरकार ने उसे अपना माना, उसकी उम्र चालीस पार हो चुकी थी; पेंशन की न्यूनतम योग्यता पूरी करने के लिए उसे फिर पंद्रह साल और काम करना पड़ा।

वह गणित ईमानदारी से पढ़ाता, बेहद सादगी से जीता, और ज़्यादातर उबले आलू के भुरते के साथ सादा शाकाहारी खाना खाकर दिन गुज़ारता। लोग उसे “अलहदा किस्म का टीचर” कहते, पर यह उपनाम भी उस आदमी के लिए कुछ ज़्यादा ही चमकीला लगता था। वह तो इतना साधारण था की अपनी कमीज़ को अंगोछे में लिपटी ईंट से इस्त्री करता था।

फिर भी, उसके भीतर कहीं एक बेचैनी हमेशा बनी रहती—यह दुनिया से शिकायत नहीं थी; यह अपने ही भीतर उठती किसी अर्थपूर्ण वार्ता की चाह थी। आत्मचिंतन: अंतरावलोकन। 

पचपन की उम्र में उसने नौकरी छोड़ दी। बहुत थोड़ी-सी बचत समेटी और तय किया कि वह अब आत्मचिंतन ही करेगा जिसे वह पूरी ज़िंदगी टालता आया था।

वह पैदल पूरी यात्रा पर निकला—पूरे पंद्रह दिन चलते-चलते, पेड़ों के नीचे सोते हुए, सार्वजनिक नलों में नहाते हुए, और चाय तभी पीते जब कोई ज़बरदस्ती पिलाता। उसकी दाढ़ी अनजाने में बढ़ती गई और एक गरिमा-सी लेने लगी, जिसे वह खुद पहचान न पाया। एक दिन सड़क के किनारे का चाय वाला पैसे लेने से मना कर बोला, “साधु बाबा को चाय देने का पुण्य मिलता है”—तब जाकर प्रभाकर बाबू को समझ आया कि उसकी इज़्ज़त क्यों बढ़ गई थी।

जगन्नाथ मंदिर पहुँचने तक वह लगातार सोचता रहा, पर कोई इच्छा ही नहीं उपजी जिसे वह भगवान के समक्ष व्यक्त करें। उसने जीवन के आम इच्छाओं को बहुत पहले पीछे छोड़ दिया था—न धन, न विवाह, न आराम, न लंबी उम्र। बस एक ही ख़्वाहिश थी—भगवान से एक सवाल पूछना।

लेकिन… सवाल क्या था, यही उसे पता नहीं था।

इसलिए वह मंदिर के अंदर जगन्नाथ जी के सामने खड़ा रहा।

घंटों बीत गए, फिर भी वह खड़ा रहा।

और लगातार बारह घंटे तक खड़ा रहा—जब तक कि सुरक्षाकर्मियों ने धीरे से बाहर करते हुए कहा, “बाबू, दर्शन ख़त्म… अब घर जाओ।”

वह बाहर आकर मंदिर प्रांगण में बैठ गया। एक दिन बीता। फिर दूसरा। फिर तीसरा। वह कोशिश करता रहा कि कोई ऐसा सवाल मिले, जो भगवान से पूछने लायक हो। वह खुद को समझाता रहा: कुछ तुच्छ नहीं मांगना, कुछ स्वार्थी नहीं।

लेकिन कुछ नहीं कौंधा: न कोई चमत्कारी आभास, न कोई दिव्य झटका।

अगल-बगल कुछ आध्यात्मिक टट्टू सत्य और धर्म पर उपदेश झाड़ रहे थे। प्रभाकर को हैरानी हुई—बिना भगवान से एक भी सवाल किए ये लोग इतनी गहरी समझ के दावेदार कैसे बन गए? वे तो बस रटी-रटाई पद्यावलियाँ दुहरा रहे थे, मानो शब्दों के ढेर से लोगों को प्रभावित करने की ठानी हो। 

उसने पछतावों के बारे में सोचा—पर अपनी ज़िंदगी में कोई पछतावा था ही नहीं। उसके दोस्त पढ़-लिखकर बड़े अधिकारी बने, खूब कमाया, सुंदरियाँ ब्याहीं, महलनुमा मकान बनाए, बच्चों को विदेश भेजा, बढ़िया रिश्ते किए… और सबके बावजूद प्रभाकर को कोई मलाल नहीं हुआ।

उसके मन में उठा—ज़िंदगी में किन-किन लोगों को वह जाने-अनजाने में दुःख पहुँचाया होगा? साफ़-साफ़ बोलने की आदत थी, इसलिए सूची तो लंबी निकलनी ही थी; मगर ज़्यादातर मामले इतने हल्के-फुल्के और तुच्छ थे कि खुद उसे भी हँसी आ जाए। एक बार उसने यूँ ही बहस में कह दिया था कि “सफल होने के लिए आदमी का शरणार्थी होना ज़रूरी है।” असल में वह दृढ़ता और फिर से उठ खड़े होने की ताक़त की बात कहना चाहता था, पर बात कुछ ऐसी निकली कि उसे सुनकर किसी का भी मन चुभ जाए। और उसमें भी सबसे ज्यादा चोट पहुँची होगी उस मेधावी लड़की को—जिसका परिवार बंगाल विभाजन के समय पूर्वी बंगाल से आया था। उसने प्रभाकर की तरफ़ ऐसी तीखी नज़र डाली थी कि एक पल को उसे लगा, उसके घुटने जवाब दे देंगे। वो नज़र आज तक उसके साथ चलती आई। ज़िंदगी भर प्रभाकर चाहता रहा कि कभी उससे दोबारा मिलकर माफ़ी माँग ले, पर वह लड़की ग्रैजुएशन के बाद जैसे हवा हो गई—न कहीं दिखी, न कोई ख़बर मिली।

जब उसने पीछे मुड़कर देखा, तो पाया कि जिन लोगों को उसने “दुख पहुँचाया” था, वे तो बस उसकी बेवक़ूफ़ी भरी, आधी-मज़ाक-वाली बातों को कब का भूल चुके थे। वे सब ऐसी ही बातें थीं जिन्हें वक़्त अपने आप मिटा देता है।

उसने अपूर्ण सपनों के बारे में सोचा—पर वह कभी सपने देखने वाला था ही नहीं। शादी का खयाल भी सिर पर आया, और वह खुद ही हँस पड़ा—पचपन की उम्र में शादी करने के लिए भला भगवान से क्या पूछना? क्या ऊपर वाले से यह भी पूछना ज़रूरी है कि अपने ऊपर कब हँसना है?

चौथे दिन उसने हार मान ली। और एक अजीब-सी शांति के साथ उसने जगन्नाथ जी से मन ही मन कहा:

प्रभु, फिलहाल मुझे इजाज़त दें। जब कोई सवाल मेरे मन में उठेगा, मैं लौट आऊँगा। और अगर आपके पास मेरे लिए कोई सवाल हो—तो वह भी खुद-ब-खुद मेरे मन तक रास्ता बना लेगा।“

फिर वह अपनी झोली उठाकर पुरी से निकल पड़ा—इस बार कोणार्क की ओर।

पुरी जहाँ भगवान का घर था, वहीं कोणार्क मनुष्य का देह का मंदिर था—तराशा हुआ, संवेदनाओं से भरा, पूरे निःसंकोच भाव से सांसारिक। प्रभाकर समुद्र के किनारे बैठकर सोचने लगा कि इन अनगिनत प्रस्तर-आकृतियों के बीच जीवन उसे कौन-सी दिव्य दिशा दिखाना चाहता है।

रात भर वह जागता रहा। आधी रात बीत गई। अप्रैल की हवा में हल्की ठंड घुल गई। लेकिन उसे फर्क नहीं पड़ा। वह बस यही सोचता रहा:

आख़िर ऐसा कौन-सा सवाल है, जिसे मैं जीवन भर अपने सीने में दबाए फिरता रहा?”

और तभी, रात गहराने पर, एक छोटी-सी बचपन की याद उभर आई—धीरे-धीरे, जैसे किसी पुराने कुएँ की तलहटी से एक पत्ता ऊपर आ रहा हो।

जब वह सात साल का था, पिता के साथ ननिहाल से पैदल लौट रहा था। रास्ते में एक छोटा-सा स्टेशन पड़ा।

पिता ने कहा, “यहाँ रुको। मैं अभी आता हूँ।”

पर उनका “अभी” बहुत लंबा खिंच गया। चार ट्रेनें आईं और चली गईं। शाम रात में बदल गई। भूख पेट में ऐसे कुलबुलाने लगी जैसे कोई धीमी जलन हो।

उसने सोचा—क्यों न किसी ट्रेन पर चढ़ जाऊँ और किसी अनजान शहर में उतर जाऊँ, जहाँ रसगुल्ले भी मुफ्त मिलते हों और सर्दियों में सब लोग ऊनी कपड़े पहनते हों। फिर सोचा—शायद पिता किसी साहूकार के सामने हाथ पसारने गए हों, और अपने अपमान का गवाह बनने से बचाने के लिए उसे स्टेशन पर छोड़ गए हों। यह भी सोचा—कहीं माँ की नज़र बचाकर किसी दूसरी औरत से मिलने तो नहीं गए? गाँव में उसने एक चाचा को ऐसा चक्कर करते भी देखा था, जिसके लिए चाचीजी बहुत चिंतित रहती थीं। और आख़िर में, एक डरावना ख़याल—कहीं वे अपनी जान देने तो नहीं चल दिए? कर्ज़ में डूबे गाँवों में ऐसी फुसफुसाहटें अक्सर सुनी जाती थीं।

उसने वह सब कुछ कल्पना किया जो एक डरा हुआ बच्चा कर सकता है। बल्कि उससे भी ज़्यादा, जैसे उमर से पहले समझदार हो गया हो।

उसकी आँख लग गई। सपने में वही भोज—रसगुल्ला, पुलाव, माँस—जो भूखे बच्चों को दिखाई देता है।

रात के दस बजे पिता लौटे।

चुपचाप। स्तब्ध-से।

देरी में लौटने के लिए न कोई माफी, न कोई सफाई।

दोनों अँधेरे में चुपचाप चलते हुए घर पहुँचे। आधी रात को पूरा परिवार भूखा ही सो गया—जैसा अक्सर होता था। महाजन के घर से खाली हाथ लौटना कोई रोमांचक ख़बर तो थी नहीं कि वह अपनी पत्नी को नींद से उठाकर सुनाते! 

अगली सुबह वह स्कूल से अनुपस्थित रहा। उसकी तीन बहनों के साथ जंगली धान बटोरने परती, पानी भरी ज़मीनों की ओर निकल गए। उलटे झोंकों से सुपली झटकते-झटकते दोपहर तक इतना अनाज इकट्ठा हो गया कि घर ले जाकर कूटने-पीसने पर उससे तीन–चार किलो जंगली चावल निकलेगा। ज़िंदगी चलती रही—लेकिन सवाल वहीं अटका रह गया

उस दिन पिता कहाँ गए थे? और उसे अकेला क्यों छोड़ गए थे?

पचपन साल तक प्रभाकर ने उस सवाल को दफनाए रखा। पर कोणार्क के समुद्र तट पर वह फिर उभर आया—कच्चा, पूरा का पूरा, बिना किसी शब्द के।

पहली बार प्रभाकर ने चुपचाप समझा कि उसके पिता उस दिन अपने ही दानवों से जूझ रहे होंगे—कर्ज़, शर्म, लाचारी, शायद सब खत्म कर देने का भी भयानक खयाल।

लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। वह वापस आए। देर से, थके हुए, खामोश… लेकिन पूरे के पूरे।

इस प्रकार एक आदमी जो भाग सकता था—वह रुका रहा।

जो मर सकता था—वह जी उठा।

जिसके पास कुछ नहीं था—उसने अपने बेटे को फिर भी घर पहुँचाया।

यह सिलसिला किसी सवाल का जवाब नहीं था—पर पिता के भीतर की लड़ाई की एक झलक थी। और वही काफी थी।

प्रभाकर कोणार्क से चला—पुरी, फिर अपने गाँव। अब उसकी यात्रा भगवान से सवाल पूछने की नहीं थी—बल्कि पिता को मन-ही-मन धन्यवाद देने की थी।

एक महीने बाद वह गाँव पहुँचा।

उसने फिर से ज़रूरतमंद बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाना शुरू कर दिया। बच्चे फिर लौट आए—कुछ सचमुच ग़रीब, कुछ अमीर जो ग़रीब होने का अभिनय करते थे, और कुछ ऐसे जो उनसे भी ज़्यादा ग़रीब दिखने की कला में पारंगत थे। गाँव की वही अदला-बदली वाली परंपरा चलती रही—किसी का बाल कटे तो बदले में हज्जाम को आम या धान मिल जाए। छात्र अपने घरों की सब्ज़ियाँ लाते, और प्रभाकर उन उबले आलुओं में वही थोड़ा-बहुत स्वाद मिला लेता।

लेकिन इस बार कमरे के एक कोने में, दीवार पर बच्चों की ओर मुख करके, उसने एक चीज़ रख दी—अपने पिता की काले-सफेद रंग की तस्वीर। न माल्यार्पित, न देवी-देवता की तरह पूजित—बस एक शांत, मौन साक्षी की तरह।

जब बच्चे पूछते, “सर, ये कौन हैं?”

वह बस मुस्कराकर कहता,

एक आदमी… जो कभी राह भटक गया था। पर लौट आया। और उसी के लौट आने से आज मैं तुम्हें पढ़ा पा रहा हूँ।”

उस जवाब के बाद बच्चों की जिज्ञासा भी धुँधली पड़ जाती।

और प्रभाकर ने फिर कभी भगवान से कोई सवाल नहीं पूछा। क्योंकि पिता की तस्वीर के सामने, अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए, वह उसी जवाब को जी रहा था—जिसकी तलाश में वह इतनी दूर चला गया था।

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By

अनन्त नारायण नन्द 

बालासोर / 28-11-2025 

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