The Unadorned

My literary blog to keep track of my creative mood swings with poems n short stories, book reviews n humorous prose, travelogues n photography, reflections n translations, both in English n Hindi.

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I'm a peace-loving married Indian male on the right side of '50 with college-going children, and presently employed under government. Educationally I've a master's degree in History, and another in Computer Application. Besides, I've a post graduate diploma in Management. My published works are:- (1)"In Harness", ISBN 81-8157-183-5, a poetry collections and (2) "The Remix of Orchid", ISBN 978-81-7525-729-0, a short story collections with a foreword by Mr. Ruskin Bond, (3) "Virasat", ISBN 978-81-7525-982-9, again a short story collection but in Hindi, (4) "Ek Saal Baad," ISBN 978-81-906496-8-1, my second Story Collection in Hindi.

Thursday, September 13, 2012

दो ताबूत : A Pair of Coffins

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Here is a post in Hindi. It is  really long since I have posted any Hindi post in my blog. The last one was more than a year ago, while I copied the text of a short review of my book "एक साल बाद "   that appeared in Navneet. Today the 14th of September is Hindi Day and I thought I should do something symbolic as my blogging activity. There was nothing instantly available that can be pasted just like that. Whatever I have in my hard drive in electronic format, they are not compatible for posting on a browser platform. The text of my Hindi books are in True Type Font  which cannot be directly uploaded. And if I were to type a story here right from the scratch, it would take the greater part of my night. So I tried to locate a convertor with capability to convert text from .ttf format to Unicode. My search was successful as I stumbled upon the link at http://uni.medhas.org/ which worked reasonably well. In the process of conversion only a few junk characters got generated which I had to clear manually. Now the result is here to see. I am happy about it.
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दो ताबूत

                'हमलोग जाति में पिछड़े वर्ग के हैं--तो क्या यह हमारा अपराध है ? क्या सिर्फ़ इसलिए लेटर बॉक्स हमारे मुहल्ले से हटाया जाएगा? ज़रा सावधानी से काम लें, वरना आंदोलन छिड़ जाएगा ।वाई. माधव राव इस प्रकार वरिष्ठ डाक अधीक्षक को चेतावनी दे रहे थे ।
 
               'माधव रावजी, बात ऐसी नहीं है । दरअसल सौ मीटर से कम फ़ासले में ये दोनों लेटर बॉक्स हैं । और चिट्ठी के नाम पर मुश्किल से हफ़्ते में एक-दो इनमें डाली जाती । किसी एक को तो हटाना ही होगा न?’ वरिष्ठ डाक अधीक्षक बालक्रिश्ननजी उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे थे ।

                अधीक्षक के बहुत समझाने पर भी नाराज़ तृणमूल नेता माधव रावजी मानने को तैयार न थे । वहाँ उपस्थित समर्थकों ने नारों की बौछार करने लगे । 'माननी होगी, माननी हागी, बात हमारी माननी होगी । नहीं हटेगा, नहीं हटेगा, लेटर बॉक्स नहीं हटेगा । नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे, अत्याचार नहीं सहेंगे ।

                माधव रावजी ज़ोर दे रहे थे कि यदि लेटर बॉक्स हटाना ही है तो विक्रम राव के घर के  सामने वाला लेटर बॉक्स हटेगा । आख़िर पिछड़े वर्ग को भी कुछ अधिकार होता है ! डाक विभाग उसका अतिक्रमण कैसे कर सकता है ?

                विक्रम राव भी कुछ कम ताक़तवर नेता न थे । वे थे तो उच्च वर्ग के, पर उनकी जान-पहचान सभी वर्ग के नेताओं से थी । यहाँ तक कि मधुपुर चुनाव क्षेत्र से चुने गए सांसद भी उन्हें ख़ूब मानते थे । मजाल है कि कोई उनके घर के सामने से लेटर बॉक्स हटा दे । विक्रम रावजी एक दिन स्वयं वरिष्ठ डाक अधीक्षक के कार्यालय में आए और बेरोकटोक बोले, 'लेटर बॉक्स मेरे लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है । अगर इसे कोई हटाने की साज़िश करे तो मैं चुप नहीं रहूँगा और बात ऊपर तक ले जाऊँगा । संसद में इस मुद्दे को उठाऊँगा और सारे अधिकारियों का तबादला करवा दूँगा ।

                वाक़ई, राजनीति की उबलती हुई कड़ाही थी छोटा-सा शहर मधुपुर । छोटी-सी बात को बड़ा मुद्दा बनाना वहाँ आम बात थी और उस पर जनसभा बुलाना तो हर किसी के बस की बात हो गई थी । मुद्दों में गरमाहट लाने के लिए कोई चुनाव तक इंतज़ार करना नहीं जानता था । एक दिन बच्चों के ऊपर अत्याचार को लेकर स्कूल निरीक्षक कार्यालय के सामने पिकेटिंग हो गयी तो दूसरे दिन पुलिस की मनमानी पर बयानबाज़ी । कभी पेट्रोल की क़ीमतों में बढोत्तरी को लेकर तो कभी अमेरिका के इराक पर आक्रमण को लेकर जन आंदोलन ।

                बालक्रिश्ननजी अधीक्षक होने के नाते चाहते थे कि अपने मंडल में सुधार की सारी संभावनाओं पर कार्यान्वयन हो । जहाँ आवश्यकता से अधिक डाकख़ाने हैं उनको बंद करवाकर अत्यावश्यक स्थल पर उन्हें खुलवाया जाए । परंतु किसी डाकघर को बंद करने की बात कौन करता? मुँह खुलते ही इसकी भनक जो सबको लग जाती थी और अख़बारों से बात ऊपर तक पहुँच जाती । आख़िर में विभाग की तरफ़ से सबको दिलासा देकर कहना पड़ता था कि डाकघर बंद करने का कोई इरादा नहीं है । इस प्रकार नए रिहायशी इलाक़े में डाकघर नहीं खुल पाते थे । लगता था एक ही शहर मधुपुर में दो-दो इलाक़े हैं--एक वह इलाक़ा जहाँ डाकघर ही डाकघर थे और दूसरा वह, जहाँ डाकघर के लाले पड़े थे ।

                 जब बालक्रिश्ननजी डाकघरों को स्थानांतरित करने में असमर्थ रहे तो उन्होंने लेटर बक्सों पर नज़र डाली । उन्हें पता चला कि अपने मंडल में लेटर बक्सों की तादाद ज़रूरत से कई गुना ज़्यादा है । वे अपने काम पर जुट गए कि कहाँ कितने बॉक्स चाहिए उसका एक चार्ट बनवाया जाए। उन्होंने अपने अधीनस्थ निरीक्षकों को काम बाँट दिया और कड़ा निर्देश दिया कि दो महीने के अंदर यह काम पूरा हो जाना चाहिए ।

                 इस प्रकार मधुपुर में लेटर बॉक्स को लेकर स्थिति बड़ी विकट हो गई थी । उसे निपटाने हेतु अधीक्षक ने अपने दिमाग़्ा पर ज़ोर दिया । मौक़े पर दोनों पक्षों के प्रमुख सदस्यों को बुलवाकर वे विचार-विमर्श करने लगे, परंतु इससे कुछ फल निकलने वाला नहीं था । दोनों पक्ष अपनी-अपनी सोच से एक इंच भी हटने को तैयार न थे । अंत में अधीक्षकजी ने अपनी तरफ़ से उन लोगों के लिए एक प्रस्ताव रखा । इसका सारांश समझाते हुए बोले, 'देखिए, चिट्ठी जिस तादाद में डाली जाती हैं, उसके हिसाब से दो लेटर बॉक्स सौ मीटर से कम फ़ासले में नहीं रखे जा सकते हैं । एक ही काफ़ी है और एक ही लेटर बॉक्स रखा जाएगा । अब किसके घर के सामने रहेगा यह हमें तय करना है । मेरा निर्णय यह है कि आप दोनों में से जिसने पिछले छ महीने में ज़्यादा रजिस्ट्री की है, उसके घर के सामने लेटर बॉक्स रहेगा ।

                 पहले तो दोनों इसे स्वीकार करने के पक्ष में न थे, पर अधीक्षकजी ने अपना पक्ष साफ़ कर दिया । 'अगर आप लोग प्रमाण के तौर पर रजिस्ट्री रसीद प्रस्तुत नहीं कर पाएँगे, तो इसका मतलब आप लोग डाक विभाग द्वारा मुहैया की जाने वाली सेवाएँ इस्तेमाल नहीं करते हैं, और इससे यह पता चल जाएगा कि सचमुच आप डाक सेवा को छोड़कर प्राइवेट सेवा इस्तेमाल करते हैं । फिर यहाँ लेटर बॉक्स की क्या ज़रूरत?’ 

                   माधव राव गुट में एक होशियार लड़का था, जो डाकघर के बारे में बहुत कुछ जानता था। वह अपने नेता को समझाने लगा, 'नेताजी, रजिस्ट्री रसीद इकट्ठा करना कोई बड़ी बात नहीं है, इसमें भेजने वाले का नाम पता नहीं रहता है । हम सब अपनी-अपनी रसीद लाकर दिखाएँ और यह सिद्ध कर दें कि हम डाकघर के कितने बड़े उपभोक्ता हैं ?’                             

                 यह सलाह वाई. माधव राव को बहुत पसंद आई । उन्होंने तुरंत चुनौती स्वीकार कर ली। बस, विक्रम राव भी क्यों पीछे हटते ? वे भी तुरंत बोल पड़े, 'हमें यह चुनौती मंज़ूर है।’                                    
 
        चुनौती कोई मामूली न थी । दोनों पक्षों ने रजिस्ट्री रसीद ख़ूब ढूँढ़ी, पर किसी को याद नहीं था कि पिछले छ महीनों के अंदर किसी ने डाक विभाग की रजिस्ट्री सेवा का इस्तेमाल किया था या नहीं । वे लोग साधारण चिट्ठी लिखना भी कब का छोड़ चुके थे, ख़ासकर तब से, जब से शहर में सेल फ़ोन की बाढ़ आ गई  । चिट्ठी लिखना तो सचमुच उन लोगों के लिए बड़ी बात थी । सरकारी आँकड़ों में मधुपुर को पूर्ण साक्षर शहरों में गिना जा रहा था, पर सच कहा जाए तो शहर में सेल फ़ोन की तादाद साक्षरों से कहीं अधिक थी । जिसे साक्षर माना जाता था, उसे सिर्फ़ 1 से 9 तक ही गिनती आती थी । ख़ैर, सेल फ़ोन के इस्तेमाल के लिए इतना ज्ञान काफ़ी था।

                 रसीद प्रस्तुत करने के लिए बालक्रिश्ननजी ने एक सप्ताह का समय दिया । मियाद पूरी होने पर विक्रम रावजी सिर्फ़ एक ही रसीद प्रस्तुत करने में सक्षम हुए । माधव रावजी तो एक भी रसीद नहीं ला सके । वे आकर कैसे मुँह दिखाते ?

                 डाक अधीक्षकजी ने जान-बूझकर ऐसी चुनौती रखी थी । उन्हें मालूम था कि पासवाले डाकघर में पिछले छ: महीने में एक भी रजिस्ट्री नहीं हुई थी । तो फिर, वे क्यों न ऐसी चुनौती रखते? लोगों के सामने सच का खुलासा करना ही उनका उद्देश्य था । शायद वे कहना चाहते थे, 'डाकघर, डाकिया, लेटर बॉक्स---ये सभी चीज़ें सिर्फ़ लोगों की प्रतिष्ठा के लिए बच गई हैं, काम के लिए नहीं ।’       

                डाक अधीक्षक बालक्रिश्ननजी हैरान थे कि आख़िर विक्रम रावजी ने कैसे एक रजिस्ट्री की रसीद प्रस्तुत कर दी, जबकि पासवाले डाकघर से पिछले छ: महीने में एक भी रजिस्ट्री की बुकिंग नहीं हुई थी । जब वे उस रसीद को खोलकर मुआयना करने लगे, तो और भी चकित हो गए । वह एक रजिस्ट्री रसीद न थी, बल्कि एक प्राइवेट कुरियर द्वारा जारी की गई रसीद थी ।

                अधीक्षकजी का शक यक़ीन में बदल गया, पर अब भी वे तय नहीं कर पा रहे थे कि दोनों में से किस लेटर बॉक्स को उखाड़ने का आदेश दें । अंत में, उन्होंने दो महीने के लिए इस पर कोई कार्रवाई न करने का निर्णय लिया । उन्हें उम्मीद थी कि समय अपने आप कोई न कोई तरक़ीब ढूँढ़ लेगा ।

                आख़िरकार वही हुआ जो डाक अधीक्षक बालक्रिश्ननजी सोच रहे थे । समय अपने तरीक़े से आगे बढ़ने लगा । आहिस्ता, आहिस्ता । विकास के लिए सड़क चौड़ी करने की आवश्यकता हुई और सड़क चौड़ीकरण के क्रम में दोनों लेटर बॉक्स ऐसे ही उखाड़ दिए गए ।

                लेटर बॉक्स ठहरी केंद्र सरकार की संपत्ति । ठेकेदार को उन्हें सही सलामत जगह तक पहुँचाना था । वह उन्हें लेकर सीधे नज़दीकवाले डाकघर के आँगन में रख आया ।

                ऐसा लगता था, मानो लड़ाई के मैदान से दो शहीदों के ताबूत उनके जन्म-स्थान तक पहुँचा दिए गए हों ।
ब्रह्मपुर, दिनांक 01-08-2007
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By
A. N. Nanda
Coimbatore
14-09-2012
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4 Comments:

Blogger ARVIND KUMAR VERMA said...

सर बहुत अच्‍छा लगा एक और जमीनी हकीकत

7:18 PM  
Blogger A_N_Nanda said...

अरविन्द बाबू
इस ब्लॉग में आपका पुनः स्वागत है. मैंने बिहारियों का प्यार नहीं भुला. किसी लेखक कलाकार को प्रोत्साहित करने में वे लोग इंडिया में अवल नंबर के हैं.
कहानी अच्छी लगी, यह सुनकर मै प्रसन्न हूँ . मेरे चाहनेवालों को आपके माध्यम से प्यार के बदले प्यार भेज रहा हूँ.
ए. एन. नन्द

4:34 AM  
Anonymous Anonymous said...

Excellent post. You must continue to offer excellent resources and content like you have been offering. I will most likely stop by again in the future.

9:58 PM  
Blogger zoyee mac said...

hello
i like your blog very much
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thanks

dainik bhasker

3:07 AM  

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