The Unadorned

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Saturday, August 08, 2026

चलती बस का नाटक


चलती बस का नाटक

सुबह का समय था। चारों ओर धुंध की चादर पसरी हुई थी और आसपास का दृश्य कुछ जादुई-सा लग रहा था। पिछली रात जैसा तय हुआ था, दोनों मित्र टहलने निकल पड़े। बीच-बीच में हवा के हल्के झोंके धुंध को हिला देते थे—मानो संकेत कर रहे हों कि वह अधिक देर टिकने वाली नहीं।

आरोहण कुछ क़दम पीछे, एकदम ख़ामोश चल रहा था। मयंक उसके बराबर आने का इंतज़ार करता रहा। हो सकता था, आरोहण फिर कोई सपना सुनाए और उसके अतीत के कुछ और टुकड़े सामने आ जाएँ। फिर भी मयंक चौकन्ना था—कहीं कोई पुराना, दर्द से भरा सपना लौट आया और उसका दोस्त फिर उसी पीड़ा में डूब गया तो? वह उसे उस पीड़ा से कैसे बचाएगा?

लेकिन जल्द ही उस ख़ामोशी में रूखापन नहीं, बल्कि आत्मीयता घुली हुई जान पड़ी। दोनों आगे बढ़ते रहे और सन्नाटे में आरोहण की रबर की चप्पलों की थाप सुनाई देती रही। धीरे-धीरे वही मामूली-सी आवाज़ मयंक के मन में कोई अर्थ रचने लगी।

सुनो, एक बात याद आई,” आरोहण ने चुप्पी तोड़ी।

क्या? सचमुच कुछ याद आया? क्या याद आया, आरोहण?” मयंक ने अधीरता से पूछा। उसे दोस्त की अगली बात से बड़ी उम्मीद बँध गई थी।

मुझे अपने बचपन का एक सपना याद आया,” आरोहण बोला।

मयंक समझ नहीं पाया—वह सपना आरोहण ने बचपन में देखा था, या वह हाल का कोई ख़्वाब था जिसका संबंध उसके बचपन से था।

बिना किसी भूमिका बाँधे, आरोहण अपना ख़्वाब सुनाने लगा।

***      ***      ***      ***

कुछ यादें कभी नहीं मिटतीं—बस दिलो-दिमाग़ की किसी गहरी तह में उतरकर रह जाती हैं। जब नुक़सान हो ही चुका हो, तो अतीत को कौन दोबारा बना सकता है? और पीछे लौटकर इंसाफ़ भी कैसे पाया जा सकता है? काश, ऐसा मुमकिन होता!

उस वक़्त मैं तेरह साल का एक देहाती लड़का था—झिझक से भरा और आत्मविश्वास से ख़ाली। कौन-सी किताब पढ़नी है, कौन-सी फ़िल्म देखनी है, कौन-सा खेल खेलना है, किन लड़कों से दोस्ती करनी है—यह सब मेरे बड़े-बुज़ुर्ग ही तय करते थे। ‘क्या करना है और क्या नहीं’ की सूची अंतहीन थी—किसी पवित्र पेड़ पर मत चढ़ो; तैरने की कोशिश मत करो; वाद्ययंत्रों को हाथ मत लगाओ; वग़ैरह-वग़ैरह। बच्चे को बड़ों की बराबरी नहीं करनी चाहिए—आख़िर यही उस दुनिया का उसूल था।

कभी कोई बड़ा लड़का रहम खाकर समझाता भी, तो यही कहता, “अरे बेवक़ूफ़! पहले सीखो, फिर करके दिखाओ, समझे?”

बात अपनी जगह ठीक थी, मगर उसमें एक साफ़ विरोधाभास था—अगर कोई काम शुरू ही न करे, तो उसे सीखेगा कैसे?

ऐसा नहीं था कि मैं इस लगातार दबाव से दुखी नहीं था। मगर मेरा विरोध न तो सही समय पर सामने आता था, न उस रूप में जिसे बड़े बर्दाश्त कर सकें। नतीजा यह होता कि वह हर बार सज़ा की बारिश बनकर मुझ पर लौटता।

सज़ा? जी हाँ। मुझे सताने वालों का यक़ीन था कि बच्चे इसी तरह सुधरते हैं। असल में वे मेरी मासूम जिज्ञासाओं को कुचल रहे थे—जानने, पूछने, खोजने, सुधारने, सँजोने और अपने लिए कुछ चुनने की इच्छा को।

ख़ैर, अब और नहीं भटकूँगा। सीधे अपने ख़्वाब पर आता हूँ।

उस दिन मेरे सब्र की सारी हदें टूट चुकी थीं। गाँव का साहूकार महाजन अपनी अपमानजनक हरकतों से मुझे भीतर तक तोड़ चुका था। वह मुझसे यह क़बूल करवाना चाहता था कि मैंने उसके पेड़ से अमरूद तोड़े हैं। उसका सबूत बस इतना था कि उसने मुझे एक बार बाँध की मेड़ पर खड़े बरगद पर चढ़ते हुए देख लिया था। मानो बरगद पर अमरूद फलते हों—या वह महाजन का कोई जादुई बरगद रहा हो!

फिर उसने मुझे एक तमाचा जड़ दिया—चोरी की भरपाई के लिए नहीं, बल्कि यह जताने के लिए कि गाँव के बच्चों को अनुशासन में रखने का अधिकार उसी को है। उस वक़्त कोई राहगीर ज़रा-सी भी हमदर्दी दिखा देता, तो महाजन उसे ज़रूर समझाता, “बच्चा है तो मार पड़ेगी ही—जितनी ज़्यादा, उतना अच्छा।”

मगर अफ़सोस, वहाँ मेरी मदद करने वाला कोई नहीं था।

मैंने उस तमाचे को झटककर भुलाना शुरू ही किया था कि गालियों की दूसरी बौछार आ गई। इस बार मेरे संगीत-उस्ताद की बारी थी। अपनी तीखी, नाक से निकलती आवाज़ में उन्होंने मुझे ख़ूब कोसा।

ज़रा ठहरिए! अब मंच पर मेरे बाप का प्रवेश हुआ—ढाढ़स बँधाने के लिए नहीं, बल्कि उस दिन का आख़िरी और सबसे सख़्त प्रहार करने के लिए। उन्होंने मुझे बेरहमी से पीटा।

फिर भी मैं अपने पिता को माफ़ करने को तैयार था। मैं जानता था कि वे महाजन के क़र्ज़दार हैं और उसके सामने उनकी भी ज़्यादा नहीं चलती। वैसे, गाँव में उसका क़र्ज़दार कौन नहीं था? चमकते गंजे सिर वाला संगीत-उस्ताद; छड़ी और नाक पर लटकते चश्मे वाला हेडमास्टर; चोटीधारी पुजारी; कंधे पर थैला लटकाए घूमने वाला लापरवाह हकीम—सब अपने-अपने क़र्ज़ और उस पर चढ़ते सूद के बोझ तले दबे थे।

मेरे और मेरे बाप के बीच खड़ी दीवार भी आख़िर पैसे की ही थी—कुछ हज़ार रुपए की एक दीवार, जिसे चुकाकर गिराया जा सकता था।

मैंने ठान लिया था कि अब क्या करना है—घर छोड़ना है, रोज़ी-रोटी कमानी है और फिर लौटकर उस नीच महाजन को ललकारना है—“ले, अपना मनहूस पैसा और हमें चैन से जीने दे।”

यह नामुमकिन नहीं था। कहीं न कहीं कोई ऐसा शहर ज़रूर होगा जहाँ मेहनती और ईमानदार लोगों के लिए काम की कमी न हो। मैं जी लगाकर मेहनत करूँगा, ईमानदारी से काम करूँगा और सबकी नज़र में अपनी अलग जगह बनाऊँगा।

रात भर ख़ुद को समझा-बुझाकर मैंने उस बड़े अभियान की तैयारी कर ली थी। मैं उतावला था। “जो होगा, देखा जाएगा”—यही मेरा नारा बन चुका था। ज़िंदगी की पहली नौकरी में मैं पूरी लगन से काम करूँगा, ताकि बाद में किसी बात का पछतावा न रहे।

पूरब में सुबह की पहली किरण भी नहीं फूटी थी। घर में किसी के जागने से पहले ही मैं निकल पड़ा। एक छोटे-से थैले में तीन बासी रोटियाँ और गुड़ की कुछ डलियाँ रख ली थीं। रास्ता सुनसान था; दूर तक कोई नहीं मिला। कुछ देर बाद क्षितिज पर उगते सूरज ने ही मेरा साथ दिया। मैं ठीक समय पर निकल आया था—किसी को मेरे जाने की भनक तक नहीं लगी।

ओस से मेरे पाँव तर-बतर थे और रबर की चप्पलों से उछलती गीली मिट्टी निकर तक पहुँच रही थी। मेरी निगाह रास्ते पर थी और चप्पलें लगातार एक-सी थाप बजा रही थीं—ठीक वैसी ही, जैसी अब तुम सुन रहे हो। मगर मैं आने वाले कल की फ़िक्र में इतना डूबा था कि उस आवाज़ पर ध्यान ही नहीं गया। हवा में हल्की ठंडक थी और मैं लंबे, हौसले से भरे डग भरता चला जा रहा था।

इस तरह मैं घर से भाग निकला था—इस इरादे के साथ कि जल्द ही पैसा कमाकर लौटूँगा और साहूकार को ललकारूँगा। माँ ने न जाने कितनी रातें जाग-जागकर ईश्वर से प्रार्थना की थी। एक बार मैंने वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि हमारा गिरवी पड़ा घर साहूकार की दया पर टिका है। बेचारी माँ! दिन भर जी-तोड़ मेहनत करने के बाद क्या उन्हें रात को चैन की नींद भी नसीब नहीं होनी चाहिए थी?

उस रास्ते की पहली बस समय पर आ गई और मैं उसमें चढ़ गया। जेब में इतने ही पैसे थे कि टाटानगर की टिकट ले सकूँ—वही इस्पात नगरी, जो मुझे रोज़गार का वादा करती जान पड़ती थी।

सफ़र दस घंटे का था और उसमें दिन का अधिकांश हिस्सा बीत जाना था। रास्ता झटकों से भरा था, लेकिन दोनों ओर हरियाली फैली हुई थी। खिड़की से बाहर झाँकते हुए जंगल और गीली मिट्टी की ख़ुशबू को साँसों में भर लेने पर सफ़र की थकान कम महसूस होती थी। मेरे लिए तो यह सब बिल्कुल नया था। मैं इससे पहले अपने ज़िला मुख्यालय से आगे कभी नहीं गया था, और वह भी गाँव से मुश्किल से तीस किलोमीटर दूर था। पहली बार मुझे लगा कि मेरी जानी-पहचानी धरती अचानक फैल गई है। वह पहले से कहीं अधिक विशाल और ख़ूबसूरत दिखाई दे रही थी—उस गाँव से बिल्कुल अलग, जहाँ बेदख़ली का डर हर समय हमारे सिर पर मँडराता रहता था।

कुछ ही देर में रास्ते और उसके दृश्यों से एक अनजाना-सा अपनापन महसूस होने लगा। उससे मन की घबराहट कुछ कम हुई, फिर भी भीतर एक सवाल बना रहा—टाटानगर पहुँचकर मैं करूँगा क्या?

रेलवे स्टेशन पर ही डेरा डाल दूँगा,” मैंने सोचा।

इस ख़याल ने अचानक मेरे भीतर नया आत्मविश्वास भर दिया। जब आगे का कुछ पता न हो, तब “जो होगा, देखा जाएगा” का भरोसा ही सबसे बड़ा सहारा बन जाता है—यह बात उसी समय मेरे दिल में उतर गई।

दोपहर के क़रीब बस खाने के लिए थोड़ी देर को रुकी। सड़क किनारे कई ढाबे थे। ज़रा आगे, सड़क के दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे सेमल के पेड़ कतार बाँधे खड़े थे, जिनकी जड़ें बाहर को उभरी हुई थीं। मुझे अब भी वहाँ की मिट्टी की लाल रंगत याद है—मेरे गाँव की धरती से बिल्कुल अलग। और याद है वो हवा, जो इपोमिया की झाड़ियों से होकर आती थी—एक तीखी, मदहोश कर देने वाली ख़ुशबू लिए हुए।

जिन्हें खाना है, उतर जाओ, वरना अंदर ही रहो। मैं बाहर से बस लॉक कर दूँगा,” दरवाज़े पर खड़े कंडक्टर ने ऐलान किया। यही उसका सुरक्षा इंतज़ाम था—चोरी से बचाव के लिए ज़रूरी।

सारे मुसाफ़िर एक-एक कर उतर गए—बस मैं ही अंदर रह गया। ढाबे पर जाकर कुछ खाने लायक पैसे भला मेरे पास कहाँ थे? अपने थैले को ऊपर-ऊपर से टटोला—रोटियाँ और गुड़ जस-के-तस! मेरे भीतर का भगोड़ा घर से भाग सकता था, मगर थैले में पड़ी रोटियाँ भला कहाँ भागतीं!

मुझे सीट से चिपका देख कंडक्टर कुछ हैरान हुआ।

खाना नहीं खाओगे?” उसने पूछा।

नहीं,” मैंने कहा।

अच्छा, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।

उसने दरवाज़ा पटका, बाहर से ताला लगाया और चला गया।

मैं उसकी तेज़ चाल देखता रह गया। शायद उसे भी भूख लगी थी। उसकी भूख का अंदाज़ा लगाते-लगाते मेरे पेट ने भी खाने की माँग शुरू कर दी।

मैंने सोचा—अगर सँभालकर खाऊँ तो ये रोटियाँ दो दिन चल सकती हैं। एक साथ खा गया तो कल क्या करूँगा?

बस वहाँ आधे घंटे से कुछ ज़्यादा रुकी रही। ड्राइवर लौटा और मुसाफ़िरों को बुलाने के लिए दो बार हॉर्न बजाया। कुछ गपशप में डूबी औरतें सबसे आख़िर में चढ़ीं। सबके चेहरों पर तसल्ली झलक रही थी। शायद ढाबा सचमुच अच्छा रहा होगा, मैंने मन ही मन सोचा।

मेरी अंगूठी… हे भगवान! मेरी सोने की अंगूठी कहाँ गई?” सामने वाली सीट पर बैठी औरत अचानक चीख़ पड़ी। बस अब चलने ही वाली थी।

उसके साथ आया शख़्स—शायद उसका पति, या फिर पति जितना ही दब्बू और आज्ञाकारी कोई—झटके से उठ खड़ा हुआ। पैरों के पास सामान बिखरा पड़ा था; ऐसे में गिरी हुई अंगूठी ढूँढना आसान न था। फिर भी वह झुककर टटोलने लगा, मगर अफ़सोस—उसकी कोशिश नाकाम रही।

ठीक से याद करो, कहाँ गिरा दी अंगूठी?” उसने पूछा।

पता नहीं…” औरत ने अनमने लहजे में कहा, और उसकी निगाहें सीधी मेरी तरफ़ आ टिकीं।

तुमने मेरी सोने की अंगूठी देखी क्या? जब हम सब बाहर गए थे, तब तुम यहीं बैठे थे न?”

उसके स्वर में सवाल कम, शक़ ज़्यादा था। मैं झुँझला उठा—नहीं! मुझे क्या मालूम आपकी अंगूठी कहाँ गई?”

हम सब बाहर थे और बस में तुम अकेले थे, है न?” उस आदमी ने सीधे मुझ पर सवाल दागा।

मेरे माथे की नसें तन गईं। समझ नहीं आ रहा था कि लोग मुझ पर इल्ज़ाम लगाकर इतना सुकून क्यों पाते हैं। अभी कल ही गाँव का महाजन मुझ पर बरगद पर चढ़कर अमरूद चोरी करने का इल्ज़ाम लगा रहा था, और अब, सफ़र के बीच, यह शख़्स अपनी बीवी की खोई हुई अंगूठी के लिए मुझ पर शक़ जता रहा है!

तो क्या हुआ?” मैंने पलटकर कहा, “बस का दरवाज़ा कंडक्टर ने बाहर से बंद किया था न? ये बात आप कैसे भूल सकते हैं?”

तो फिर अपना थैला दिखाओ। मैं उसकी तलाशी लूँगा,” उसने हुक़्म दिया।

मेरा थैला क्यों?” मैंने अपनी जगह से हिले बिना कहा। क्या आप यहाँ सबके थैलों की तलाशी लेंगे, सिर्फ़ इसलिए कि आपकी अंगूठी नहीं मिल रही?”

अब तक कई लोग उस आदमी के पक्ष में आ खड़े हुए थे। मैं हैरान था—आख़िर उसमें ऐसा क्या था जो लोगों को अपनी ओर खींच रहा था? मालदार लोग अक्सर अपने आसपास दोस्त और हामी जमा कर लेते हैं। ऐसे लोग केवल फ़ायदे की उम्मीद में ही उनकी ओर नहीं खिंचते; कभी-कभी अपनी हीनभावना के कारण भी उनसे प्रभावित होते हैं। वे उनकी दोस्ती पाने को लालायित रहते हैं और बदले में उनकी बदसुलूकी तक सह लेते हैं।

उस आदमी के नए-नवेले हमदर्दों को उसकी अमीरी का एक प्रमाण भी मिल चुका था—उसकी बीवी की सोने की अंगूठी। ऊपर से उसका वह अधिकारपूर्ण अंदाज़, मानो किसी पर शक़ करना और उसके सामान की तलाशी लेना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो। लोगों को यक़ीन हो चला था कि यह उसी क़िस्म का आदमी है जिसकी तरफ़दारी करने में फ़ायदा है।

मेरे भीतर एक चीख उमड़ रही थी। सब्र तो पहले ही जवाब दे चुका था। तभी कोई मुझ पर झपटा—मानो “चोर” को पकड़ने की होड़ में सबसे आगे निकलने का तमगा उसी को मिलने वाला हो। मैंने थैला सीने से चिपका लिया। मैं उसे किसी भी क़ीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था। थैला खुलते ही उसमें रखी बासी रोटियाँ और गुड़ देखकर सवालों का सिलसिला शुरू हो जाता। फिर राज़ खुल जाता कि मैं घर से भागा हुआ हूँ। मुझे वापस भिजवा दिया जाता—और तब मैं ढेर सारा पैसा कमाकर अपनी माँ का चेहरा कैसे रोशन करता?

मैंने थैले को अपने शरीर से ढक लिया और उसे भीड़ के हाथों से बचाने में जी-जान लगा दी। मगर वे उसके भीतर झाँकने पर आमादा थे। साथ ही गालियों की बौछार भी होने लगी—

लगता है, पक्का चोर है! छोड़ना मत!”

देख लेना, यही आगे चलकर डकैत बनेगा!”

मुसाफ़िरों की भीड़ ने मुझे बस से घसीटकर बाहर कर दिया। मैं किसी तरह सँभला और थैले को सीने से दबोच ही पाया था कि एक ज़ोरदार धक्के ने मुझे पेट के बल ज़मीन पर गिरा दिया। फिर लातों की बारिश शुरू हो गई। पहली लात उसी आदमी ने मारी। उसके जूते की एड़ी में नाल ठुकी हुई थी। दूसरी लात किसी की नुकीली एड़ी वाली चप्पल से सीधे मेरे कंधे पर पड़ी। लगा, कोई औरत भी इस ज़ुल्म में शरीक हो गई थी। किसी ने कान पकड़कर मुझे उठाने की कोशिश की; सफल नहीं हुआ तो दूसरे ने बालों से खींचना शुरू कर दिया—मानो मैं कोई इंसान नहीं, अखाड़े में पड़ा पुतला था, जिस पर हर कोई अपना दाँव आज़मा सकता था।

उस हिंसक भीड़ के सामने मैं पूरी तरह बेबस था—और बिल्कुल बेक़सूर भी।

आख़िरकार थैला मेरे हाथ से छूट गया। किसी ने उसे उलट दिया और मेरी अनमोल रोटियाँ ज़मीन पर लुढ़क पड़ीं। वे पहले ही सख़्त हो चुकी थीं, मगर अब भी साबुत थीं। आह, उनकी वह बासी ख़ुशबू! काश, मैं उन्हें रसोई से उठाकर न लाया होता। तब दोपहर में मेरे घरवाले उन्हीं रोटियों के निवाले तोड़ रहे होते। ओह नहीं! शायद अब वे भूखे होंगे।

तभी मेरी आँखों के सामने किसी ने गुड़ की डलियों को बेरहमी से जूतों तले रौंद दिया—थैले से निकली मेरी आख़िरी पूँजी। मैं असहाय नज़रों से उन्हें कुचलते देखता रहा।

मगर अंगूठी उन्हें फिर भी नहीं मिली।

भीड़ केवल ज़ालिम नहीं, बल्कि चालाक भी थी। वह अपने बेशर्म ज़ुल्म पर पर्दा डालने की तरकीब जानती थी।

वह अंगूठी निगल गया होगा! इसे दोबारा बस में मत चढ़ने देना,” किसी ने आवाज़ लगाई।

सड़क किनारे खेले जा रहे उस नाटक का यही चरम दृश्य था—एक ऐसा नाटक, जिसमें हर कोई बिना किसी लिखी पटकथा के पूरे जोशो-ख़रोश से अपना किरदार निभा रहा था। इसे क्या कहूँ—सड़क-नाटक, नुक्कड़-नाटक या उसी क्षण रचा गया फ़ौरी रंगमंच? न कोई पूर्वाभ्यास था, न परदे के पीछे खड़ा कोई सूत्रधार। यहाँ तक कि कंडक्टर की चुप्पी भी उस नाटक की अदाकारी का हिस्सा लग रही थी—उसकी भूमिका लिखी हुई नहीं थी, मगर वह हर अत्याचार पर मौन सहमति दे रहा था। उसके पास खोने को कुछ था भी नहीं; मेरा किराया वह पहले ही वसूल कर चुका था।

और इस तरह, जैसे किसी अनचाहे पात्र को नाटक के बीच ही मंच से हटा दिया जाता है, उन्होंने मुझे वहीं छोड़ दिया—अपनी रोटियाँ और कुचली हुई गुड़ की डलियाँ समेटने के लिए। मानो वे भी इस तमाशे के मामूली-से प्रॉप भर हों।

***      ***      ***      ***

आरोहण चुप हो गया। उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं। मयंक हैरत से उसे देख रहा था—उसका दोस्त अभी तक सपने में सहे ज़ुल्म का किस्सा सुना रहा था, मगर अब सचमुच उसी टीस को जीता दिखाई दे रहा था। क्या ख़्वाब की तस्वीरें नींद से निकलकर उसकी जागती चेतना तक उसका पीछा करती चली आई थीं? क्या सपना ख़त्म हो जाने के बाद भी उसका भावनात्मक बोझ दिलो-दिमाग़ पर उतनी ही शिद्दत से बना हुआ था, मानो वह अब भी जारी हो?

क्या बात है, आरोहण? तुम रो रहे हो?” मयंक ने धीमे स्वर में पूछा।

आरोहण ने कोई जवाब नहीं दिया। शायद अल्फ़ाज़ उसकी सिसकियों में उलझकर रह गए थे। वह सड़क किनारे पड़े एक बड़े पत्थर पर बैठ गया। कुछ देर तक यूँ ही बैठा रहा—ख़ामोश, ग़मगीन और गहरी सोच में डूबा हुआ। फिर उठ खड़ा हुआ और दोबारा चलने लगा। भावनाओं का सैलाब ऊपर से थमा हुआ जान पड़ता था।

मयंक असमंजस में था कि क्या कहे। वह जानता था कि आरोहण अपने बचपन की जो दास्तान सुना रहा है, वह हक़ीक़त से मेल नहीं खाती। उसका दोस्त बंगले, गाड़ियों और सोने-चाँदी के गहनों वाले एक अमीर घराने से ताल्लुक़ रखता था। यहाँ तक कि उनके पास बछड़े जितना बड़ा एक ख़ूँखार कुत्ता भी था। एक बार कुश्ती करते हुए मयंक ने ख़ुद महसूस किया था कि आरोहण के गले की सोने की चेन बिजली के खंभे को सँभालने वाले स्टे-तार से भी ज़्यादा मज़बूत थी। फिर भला उसके परिवार को महाजन से क़र्ज़ लेने की क्या ज़रूरत पड़ती? विशाखापट्नम में उनकी शहरी ज़मीनों की क़ीमत करोड़ों में थी। ऐसे में मयंक उसे उस मुफ़लिस लड़के के रूप में कैसे देख सकता था, जिसका परिवार साहूकार के क़र्ज़ तले दबा हो?

जहाँ तक परवरिश का सवाल था, मयंक को कैप्टन बृजभान देव याद थे—सख़्त, मगर इंसाफ़पसंद और दिल के उदार पिता। हाँ, बचपन में बिस्तर गीला कर देने पर आरोहण को कभी-कभार डाँट ज़रूर पड़ती थी, मगर कुल मिलाकर वे बेहद स्नेही थे। उनका एक ही सपना था—अपने बेटे को आई.ए.एस. अफ़सर बनाना। फिर आरोहण उनकी इकलौती औलाद था, माँ-बाप की सारी मोहब्बत और लाड़-प्यार का स्वाभाविक हक़दार।

लेकिन मयंक ने ख़ुद मुफ़लिसी देखी थी। वह बहुत छोटा था, तभी उसकी माँ शालिनी और पिता श्रीकांत का रिश्ता टूट गया। उसके बाद माँ-बेटे विशाखापट्नम में मामा सुदर्शन के पास आ गए। वहीं एक अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में उसका दाख़िला हुआ। पिछले स्कूल में वह दूसरी कक्षा में पढ़ रहा था, मगर नए स्कूल में उसे एक दर्जा पीछे, पहली कक्षा में डाल दिया गया। उसे फिर से वर्णमाला से शुरुआत करनी पड़ी। वहीं उसकी दोस्ती आरोहण से हुई थी।

मयंक को याद था कि उसने अपने दुखद अनुभव नए दोस्त के साथ बाँटे थे, मगर उनमें वह यातना नहीं थी जिसका वर्णन आरोहण अब कर रहा था।

सुदर्शन मामा दौलतमंद नहीं थे, फिर भी उन्होंने मयंक के प्रति असाधारण उदारता दिखाई। उनकी आर्थिक हालत साल-दर-साल बिगड़ती गई, लेकिन वे अपने भांजे को अच्छी-से-अच्छी तालीम दिलाने की कोशिश करते रहे। इस कोशिश में उनकी अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई भी कहीं न कहीं उपेक्षित रह गई। कई बार मयंक के मन में आया कि पढ़ाई छोड़कर कुछ कमा ले, ताकि मामा का हाथ बँटा सके। एक बार उसने यह बात ज़ुबान पर ला दी तो मामा सन्न रह गए। उलटे ख़ुद को कोसने लगे कि शायद वे अपने भांजे की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।

पढ़ाई छोड़कर कमाने का मयंक का वह विचार कुछ-कुछ वैसा ही था, जैसा आरोहण ने अपने ख़्वाब में टाटानगर जाकर नौकरी करने का फ़ैसला करते समय महसूस किया था। मगर सहयात्रियों के हाथों आरोहण ने सपने में जो ज़ुल्म सहा, उसका मयंक की हक़ीक़त में कोई मेल नहीं था। उसने कभी मामा का घर नहीं छोड़ा था।

इन सबके बावजूद मयंक इस ख़्वाब और हक़ीक़त के टकराव के बारे में उससे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। थोड़ी ही देर पहले उसने आरोहण को रोते देखा था। इतना तो साफ़ था कि सपने की घटनाएँ उसके दिल की गहराइयों तक उतर गई थीं। यह सब असम्भव भले ही लगता हो, बनावटी बिल्कुल नहीं था।

मयंक ने बातचीत को दूसरी दिशा देने की कोशिश की।

मैं सोच रहा था, आरोहण—क्या तुम्हें विशाखापट्नम की कोई बात याद है? सचमुच कुछ भी नहीं?”

आरोहण को इस नाम से पुकारे जाने पर कोई एतराज़ नहीं था। फिर भी हर बार यह नाम सुनकर उसके भीतर एक अनकहा सवाल सिर उठाता था—अगर वह आरोहण नहीं है, तो फिर कौन है? अभी वह उस सवाल का सामना करने के लिए तैयार नहीं था।

विशाखापट्नम की? नहीं, कुछ भी नहीं। बस उम्मीद करता हूँ कि आज रात विशाखापट्नम का कोई ख़्वाब मुझसे होकर न गुज़रे,” आरोहण ने कहा।

उसके होंठों से एक गहरी आह निकल गई।

 

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By
Ananta Narayan Nanda
Bhubaneswar / / 9-8-2026
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